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झुमके...
झुमके
“कितने सुंदर
हैं ये ….मैंने ये झुमके पहले क्यूँ नहीं पहने यार”
शीशे में खुद को निहारना और खुद को खूबसूरत कहना
एक अलग
संतोष पैदा करता है मन के भीतर, बहुत खुश थी आज मैं, नए झुमके मेरे
कानों में ऐसे झूल रहे थे जैसे बेफिक्र होकर हवा में उड़ता हुआ पंछी “कल कॉलेज में
यही पहन के जाऊंगी” मैंने बड़ा इतरा कर कहा, इस तरह की इच्छा मुझे
पहले कभी नहीं हुई थी, लेकिन
इन दिनों मेरे ह्रदय का हाल कुछ और था, मैं चाहती थी कि वो लड़का जो आखिरी
बेंच पर बैठता है, सबसे
शांत, केवल
मौन, जिसकी
मधुरता
भरी मुस्कान मुझमें हलचल पैदा करने लगी थी ….वो मुझे देखे और बताये कि नए झुमके
कैसे लग रहे हैं….मुझे लग रहा था कि आज जो झुमके पहने हैं वो सबसे सुंदर हैं क्योंकि
आज शायद उसकी नज़र इन झुमकों पर पड़े और शायद उसे भी इन झुमकों में एक अलग सी स्वतंत्रता
दिखे, एक अलग
सी उड़ान दिखे, तो
कितना अच्छा हो। कल्पनाओं की दुनिया कितनी सुंदर होती है ना, लेकिन हमेशा
कल्पना में रहना वास्तव में दुःख पैदा करता है, हम बहुत
ही अलग महसूस करते हैं कल्पना के भीतर लेकिन जब वहां से बाहर निकलते
हैं तो एक अजीब सा धक्का लगता है और लगता है कि अभी-अभी
सुंदर स्वप्न देखकर नींद से उठे हैं …..
“पानी
चला जाएगा यार उमा जल्दी
जाकर नहा लो ” – उर्मि ने मुझे आवाज़ दी। उर्मि, मेरी 15 सालों पुरानी दोस्त।
हम दोनों इस वक़्त ग्रेजुएशन कर रहे थे और आखिरी साल चल रहा था, स्कूल से
निकलते ही हम लोग साथ नए शहर में रहने की बातें किया करते और किस्मत से हम लोग एक
ही pg में साथ रह रहे थे। इतने सालों के बाद अब उसकी कोई
बात बुरी नहीं लगती थी या लगती भी थी तो लगता था कि अब इस तरह का मेलजोल बैठ गया
है कि कितना भी हम एक दूसरे को झल्ला लें, कभी साथ ना छोड़ने की तसल्ली हमेशा बनी रहती। मैंने झुमके
उतारे और नहाने के लिए चली गयी जब वापिस आयी तो उर्मि खाना लेकर आ चुकी थी , हमने खाना खाया
और दोनों अपने-अपने कॉलेज के लिए निकल पड़े |
कॉलेज तक पहुँचने में मुझे २० मिनट लगते हैं , वैसे तो ये सफर
आराम से कट जाता है क्योंकि संगीत का साथ होता है लेकिन आज मेरे
कानों में झुमकों की आवाज़ और हृदय में चल रही उथल-पुथल का संगीत था, 2 साल से हम एक
ही कक्षा में पढ़ते आये हैं , लेकिन आज तक सामान्य सा "हेलो" तक नहीं
हुआ , मुझे
भी इन २ सालों में उसके प्रति कोई भाव नहीं आया किन्तु कॉलेज के आखिरी साल में उसे
इतना पसंद
करने लगूंगी पता नहीं था|
रास्ते
भर उसके बारे में सोचती रही | ख़ैर कॉलेज में पहुंची तो क्लास तक पहुँचते-पहुँचते
नज़रों ने उसे ढूंढने की यथासंभव कोशिश की लेकिन विफल रही अब लगा कि क्लास में तो
ज़रूर आएगा वो और बस एक बार दिख जाए तो दिन बन जाए | आप हैरान ना हो, प्रेम में लड़कियां भी इसी तरह सोचती हैं, कुछ देर बाद वह
क्लास में दाखिल हुआ, उसे
देखते ही मैंने एक लम्बी सांस ली, उसने नीले रंग की शर्ट पहनी थी, लेकिन सबसे
आकर्षक उसके चेहरे पर वो हल्की सी मुस्कान होती थी जो उसे और मासूम बनाती थी
"और वैसे भी वो कुछ भी पहने अच्छा ही लगता है"- मैंने अपने आप से कहा| मैं हल्का सा मुस्कराई।
हवा के झोंके जब सुहाने
लगने लगते हैं तो जिसे आप पसंद करते हैं उसकी हर एक बात आपको महत्वपूर्ण लगती है,
उसकी हर एक क्रिया में कुछ जादू नज़र आता है....
लेकिन आज भी हमेशा की तरह न मैंने ही उससे कुछ कहा न उसने ही मेरी तरफ देखा और
झुमके उदास हो गए|
जब तक कॉलेज में थी, दोस्तों के साथ
मसरूफ़ थी लेकिन उसका चेहरा बार-बार आँखों
के सामने ऐसे कौंधता मानो एक अरसे प्रेम सम्बन्ध में रहने के बाद अब बिछड़ने का
फैसला ले लिया हो और मेरा ह्रदय-मस्तिष्क इस बात को अपने भीतर घर
करने की अनुमति नहीं दे रहा| सोचती हूँ की उससे अभी तक कोई बात तक नहीं हुई थी
तो प्रेम का कारण क्या है ?
या ये
केवल आकर्षण है या वो केवल एक माध्यम है जो मुझे काल्पनिक दुनिया में ले जाता है
और मेरे भीतर का लेखक उसे हर हाल में लिखना चाहता है ? सबके लिए प्रेम
के मायने अलग होते हैं, कुछ न
कुछ तो उसके भी होंगे, लेकिन
सबसे अधिक पीड़ा देने वाला प्रश्न जो मेरे मन में बार बार किसी भयानक स्वप्न की तरह
मुझे डराता रहा - "उसे किसी और से प्रेम हुआ तो ?"
मुझे अचानक ही मेरे घर की परिस्थिति
परेशान करने लगी। अचानक से
याद आने वाली चीजें अपना वक़्त देखकर ही आती हैं, उनका आना कभी अचानक नहीं होता।
हम जब
किसी सपने को देख रहे होते हैं तो हम उस सपने को जी रहे होते
हैं , सच्चाई का उस वक़्त हम पर साया तक नहीं होता, प्रशांत मेरे
लिए उसी सपने की तरह था| दिखने
में किसी सफेद कैनवस की तरह जिसपर कई रंग इस तरह से उड़ेले जा सकते हों कि अनेक पेंटिंग
एक पेंटिंग में निहित हो और हर पेंटिंग की अपनी कोई कहानी| बादल की तरह
शांत और रंग बरसात के दौरान बनाई जाने वाली सुकून की चाय की तरह| उसका खूबसूरत
होना मुझे इतना आकर्षित नहीं करता था जितना खूबसूरत होते हुए शांत होना|
आजकल के ज़माने में किसी को भी ढूँढना बेहद आसान
हो गया है लेकिन किसी के भी पास होते हुए सच में उसके पास होना बड़ा ही मुश्किल | कॉलेज से आने
के बाद मैंने अपना फ़ोन हाथों में लिया
और हर इंसान की खबर देने वाले इंस्टाग्राम एप पर अपना अंगूठा जमाया। सर्च बॉक्स
में 'प्रशांत' लिखा और दुनिया भर की id मेरी नज़रों के
सामने थीं लेकिन अब इतनी बड़ी दुनिया में किसी एक इंसान को ढूँढना आसान थोड़ी ना है? आखिर में मुझे
वो नहीं
मिला और मेरे मन में फिर से बोझ घर कर बैठा | जब हम प्रेम
के शुरुआती दौर में होते हैं तो हमें लगता है काश ऐसा कोई तो स्रोत होता जिससे हम
उस इंसान के बारे में सब कुछ जान लें, उसकी पसंद, नापसंद , ख़ुशी, नाराज़गी, उसकी सोच, उसका अतीत और वर्तमान में उसके दिमाग में कौंधते सारे
विचार और इन सबसे महत्वपूर्ण -"क्या वो किसी से प्रेम करता है ?"
और फिर एक दिल को बैठा देने वाला डर-
"जिससे वो प्रेम करता है वो मैं न हुई तो ?" मैंने फिर एक
गहरी सांस ली | कुछ
देर आराम करने के बाद मैं अपना कॉलेज का कुछ काम करने लगी लेकिन प्रशांत की शक्ल, उसकी मुस्कान बार-बार
मेरे मन में किसी धीमे पार्श्व संगीत की तरह बजती जो मुझे चुलबुली सी मुस्कान दिए
जाती|
कुछ
दिनों बाद मेरे छठे सेमेस्टर की परीक्षाएं थी। प्रशांत कॉलेज कम आया करता था इसका
कारण मुझे नहीं पता। कॉलेज की परीक्षा पास आ
रहीं थी तो लगभग सभी बच्चे अपने घर से ही तैयारी किया करते थे, मैंने भी कॉलेज
जाना कम कर दिया था लेकिन एक दिन कॉलेज की तरफ से नोटिस आया कि सभी बच्चे समय रहते
प्रवेश परीक्षा पत्र लेने आएं नहीं तो परीक्षा में बैठने नहीं दिया जायेगा| मैं भी प्रवेश
पत्र लेने पहुंची, ज़ाहिर
सी बात है उस दिन प्रशांत भी आया था| इस बार उसे देखने के बाद भावना हृदय में बहुत तीव्रता
से आयी और जैसे मेरी सांस अटक गयी| अक्सर हम
चाहते हैं की जिससे हम प्रेम करते हैं उसके सामने हमारे सबसे अच्छे व्यक्तित्व की
पेशकश हो | मेरा मानना है कि किसी भी व्यक्ति में बहुत अच्छे
और बहुत खराब गुण दोनों
एक साथ मौजूद होते हैं लेकिन
हमें समझ नहीं आता कि अपने प्रियतम के समक्ष हम किस तरह बर्ताव करें।
अच्छा ना सही कम से कम हमारा व्यवहार उसे खराब नहीं लगना चाहिए। हम
बहुत सचेत हो जाते हैं हमारी हर एक क्रिया पर और प्रेम यही तो है आपको हमेशा अच्छा
बनने की ओर अग्र करता
है| उस दिन
केवल उससे नज़रें ही मिल पायीं लेकिन दिल का हाल अब भी दिल में ही था | कॉलेज से आकर मैंने
फिर से लोगों के समंदर में छानबीन करनी शुरू की, इस बार प्रशांत को मैंने ढूंढ लिया
था वह मेरी क्लास में पढ़ रहे एक लड़के की इंस्टाग्राम id की फोल्लोविंग
लिस्ट में मौजूद था| अब
पहली बार प्रशांत की तस्वीर मेरी नज़रों के सामने थी | कितना भव्य कितना
मनमोहक कितना सुंदर और कितना मासूम लग रहा था वह | उसने तस्वीर खींचते वक़्त गहरे भूरे
रंग की शर्ट पहनी थी, चेहरे
पे वही सुकून भरी मुस्कान, आँखों में बादल सी शांति, दायीं भौंह की अंतिम रेखा के पास एक
छोटा सा गड्ढा जो शायद बचपन में लगी किसी चोट का प्रमाण देता था, हल्के से चेहरे
को ढकते हुए दाढ़ी और मूंछ उसे घायल करने वाला युवक बना रही थी | मैंने झट से फ़ोन में
स्क्रीनशॉट लिया
और खुश ऐसे हुई मानो पिता की दी हुई वह गुड़िया मिल गयी हो जो गुम गयी थी |मुझे प्रेम हुआ है, ये सोचकर मुसकाना
भी कितना सुखद है, फिर चाहे सामने वाला आपसे कतई प्रेम न करता हो।
आपका प्रेम में होना आपका निजी मामला है इसमें किसी और की दखलंदाज़ी ठीक बात नहीं। अगले कुछ दिन मेरा कॉलेज जाना हुआ, संयोग से प्रशांत
से भी नज़रें कभी-कबार मिलती रहीं, उन्हीं दिनों मेरी सहपाठी पुष्पा ने मुझे झुमके तोहफे
के रूप में दिए, वैसे ये
तोहफा किसी अवसर का मोहताज़ नहीं था। मुझे ये झुमके इसीलिए दिए गए थे क्योंकि स्त्री
के १६ शृंगारों में से मुझे
झुमके सबसे अधिक प्रिय थे, कई चीजों के अधिक प्रिय होने का
कोई ठोस कारण
नहीं होता बस इतना है कि आपकी प्रिय चीजें आपको कुछ ऐसा लौटाती रहती हैं जिन्हें
आप कभी खोना नहीं चाहते लेकिन वह खो गया है। अगले
दिन मैंने पुष्पा के दिए झुमके पहने, कॉलेज गई और फिर प्रशांत को देखा। पहला प्रेम भी
आपमें गहरायी न लाये
तो भला
क्या प्रेम ? मैंने
कॉलेज से आते ही अपने आप को उसके प्रेम में खोये हुए अपने झुमकों द्वारा गालों को
छूकर प्रेम व्यक्त करते हुए पाया, मैं इस प्रेम को ज्यों का त्यों लिखने के लिए
डायरी और कलम उठा चुकी थी और इस वक़्त मेरा लिखना ऐसा लग रहा था जैसे कोई सुहानी सी
बारिश बहुत इंतज़ार के बाद आयी हो | मैंने लिखा -
मैं जब ये लिख रही हूँ तो मैंने झुमके पहने हुए
हैं
डरती हूं कहीं तुम ये पढ़ ना लो
और जान ना लो कि मैं तुम्हें लिखती हूँ
जब भी गुज़रते हो पास से तो ज़रा सा घबरा जाती
हूं
नज़रे झुक जाती है
और ज़रा तेज़ चलने लगती हूँ
डर लगता है कहीं तुम मेरा ज़िक्र दोस्तों में ना
करदो
हँस कर यूं ही कोई मज़ाक ना करदो
जानती नहीं तुम्हें ना समझती हूं अभी
बस तुम्हारे ख्याल से मुस्कुराती हूं अभी
तुम्हारी समझ में प्रेम क्या है नहीं जानती
इसलिए इज़हार से डरती हूँ
डर लगता है.....कि तुम्हें लिखते हुए
मैं झुमके ना उतार दूं।
2
जब-जब अपने घर की परिस्थितियां और प्रेम साथ मन में आते
हैं तो एक अजीब सी टीस और ग्लानि पैदा
होती है| लगता है मुझ जैसी लड़कियों को प्रेम
नहीं करना चाहिए जिसके माँ बाप दोनों मर चुके हों। कभी-कभी सच्चाई दिल से बहुत बड़ी दिखाई देने लगती है,
दिल बहुत व्यापक होने के साथ-साथ बहुत कोमल
होता है और सच्चाई बहुत छोटी होने के बावजूद कठोर और ज़्यादा अहमियत बटोरने वाली और
इसी सच और दिल के खेल में उलझकर हम उलझ जाते हैं, जहाँ दिल जीतता है वहां आप केवल प्रेमी हो सकते हैं
और जहाँ सच्चाई जीत जाती है, वहां आप प्रेमी के अलावा पति -पत्नी ,
भाई-बहन, बेटा-
बेटी सब अव्वल दर्जे के हो जाते हैं |
लेकिन सबसे पीड़ादायक होता है जब न आपका
दिल ही जीत पाता है और ना ही आप पूरी तरह से समाज जैसे बन पाते हैं नक़ाबपोश| आप केवल अपनी
ही एक दुनिया में खोये रहते हैं जो हमेशा आपको अधूरे होने
का
एहसास कराती रहती है|
हमारी परीक्षाएं शुरू हो चुकी थी, अब मेरा पढ़ाई
में मन बिलकुल नहीं लग रहा था और मैं इस बात से बेहद तंग आ चुकी थी, रात के 12
बज रहे थे,मैंने अंतत: फ़ोन उठाया और उसे मैसेज करने की
कोशिश की, मैंने
अपना सारा लिखा काट दिया और फ़ोन तो झल्लाकर साइड में ज़ोर से रख दिया, उसे अपने साथ
जोड़ने का ख़्याल मुझे ये एहसास कराता कि उस जितने खूबसूरत लड़के के लिए मुझ जैसी ठीक-ठीक
सी दिखने वाली लड़की का कोई मेल नहीं है लेकिन प्रेम तो व्यवहार से होता है न , प्रेम तो
विश्वास में होता है और उसके शांत होने ने मुझे ये विश्वास दिला दिया था कि वह मुझे
किसी खास प्रकार के दिखने के लिए बाध्य नहीं करेगा या ये नहीं कहेगा कि तुम अच्छी
नहीं दिखती इसलिए मैं तुमसे नहीं जुड़ सकता लेकिन वह मुझसे जुड़ चुके थे कम से कम
मेरी दुनिया में, मैं जब
भी उसकी तस्वीर को देखती तो लगता कि वह मेरा है लेकिन उसी पल लगता कि वह मेरा कभी
नहीं था और न कभी आगे हो सकता है, वह एक ऐसा सफर है जो कभी ख़त्म नहीं हो सकता|
जो चीज़ हमसे
बहुत दूर होती है, हमें अक्सर उसके सपने आते हैं।
“उर्मि
सुनो ! उर्मि , अरे उठो यार”
“हाँ क्या
है, क्या हुआ सुबह सुबह ?”
“कल फिर से
प्रशांत का सपना आया”, मैंने बड़े उत्साह से कहा, इस समय मेरे हाव-भाव सातवें आसमान
पे थे”
“अरे यार,
तू छोड़ दे उसके पीछे पागल होना, न कभी तुम्हारी बात हुई है, न कभी तुम लोग साथ
बैठे हो, सुख-दुख की बातें भी नहीं की, फिर भी पगला गई है उसके पीछे ..... सोजा
चुप-चाप”
“नहीं यार, बहुत से लोगों की सिर्फ मौजूदगी से आपको
घुटन महसूस होने लगती है, लेकिन उसकी मौजूदगी में हमेशा ये एहसास रहा है कि उसके
साथ से मैं आज़ाद हो जाऊँगी ताउम्र के लिए, सालों से पिंजरे में बंद पक्षी को खुली
हवा में उड़ने के लिए साहस देना पड़ता है नहीं तो पिंजरा छोड़ते वक्त होने वाली
घबराहट से वह कभी
पिंजरा छोड़ ही नहीं पाता,जानती हूँ अभी हमारी बातचीत नहीं हुई है लेकिन
कभी तो होगी न”
“हाँ, देखा
है मैंने तुझ जैसे फ़ट्टू को जो न तो कभी अपने दिल की बात बोल पाते हैं और सपने
लेते हैं ज़माने से भीड़ जाने के.... हूँह”
“ज़माने से
किसे भिड़ना है यार, भिड़ना तो अपनों से है, अपने साथ हों तो मैं दुनिया को धूल
समझती हूँ, और उसमें मुझे वही अपना नज़र आता है”
“तू पहले
तय करले तुझे प्रेम चाहिए या बस कोई साथ खड़ा रहने वाला बंदा”
“ये दोनों
ही बातें अगर मुझे उसमें मिले तो ?”
“फिर हो गई
मैडम चालू, इस ख्याली दुनिया से बाहर आ यार, असल दुनिया इससे बहुत अलग है, इन
किताबी बातों में कुछ नहीं रखा”
“रखा तो इस
असल ज़िंदगी में नहीं है कुछ, जहाँ देखो वहीं परेशानी, और इस असल दुनिया में अगर
मुझे घुटन महसूस होती है, तो इससे तो मेरी अपनी बनाई दुनिया ही ठीक है , कम से कम
मैं सुकून.. ”
“हाँ बस- बस, पता है जो सुकून मिलता है तुझे, पागल
कहीं की, अब चाय पिलाएगी या उसके लिए भी प्रशांत को बुलाऊँ ?”
“हाय! कैसी होगी उसके हाथ की चाय”- एक चुलबुली सी
हंसी और शरमाते हुए गाल कितने प्यारे और मासूम लगते हैं ।
चाय को उबलने के लिए जितनी आग चाहिए, उतनी आग जरूर
लगेगी, उससे कम में चाय नहीं बन सकती, उतनी ही आग देकर मैं चाय बना लाई,
“मैडम चाय पकड़ो”
उर्मि ने चाय का कप हाथों में लिया और दीवार से कमर
सटाकर बैठ गई
“आज प्रशांत से बात हो ही जाए, आज उसे बता ही दूँगी
की मेरे मन में उसके लिए क्या है?”
“ऐसे सीधा ही जाके बोल देगी कि – अजी सुनते हो हमें
आपसे प्रेम है” उर्मि ने मुझे हल्का सा छेड़ा
“तो और कैसे कहूँ, अब प्रेम सीधे-सीधे हुआ है, तो बात
भी तो सीधे ही होने ही चाहिए”
“मैडम, जैसे आपके अभी तक हाल रहे हैं, उसे देखते ही
सन्न हो जाना है आपने। आई बड़ी सीधे बात करेगी”।
“तो और कोई तरीका तो होगा, अब कहना तो पड़ेगा ही”
“हाँ, कहना तो पड़ेगा, लेकिन ऐसे नहीं, तू कॉलेज चल
बाकी का मैं देख लूँगी”
“अरे तुम क्या देखोगी, बात तो मुझे करनी है न”
“करली तूने बात, 2 साल से बात ही करी है न”
“ठीक है यार, बस कोई पंगा मत करना”
“हाँ- हाँ”
चाय अब उबल चुकी थी, बस उसे समय से चूल्हे से उतारना
और घूंट लेना बाकी था, नहीं तो चाय उबालने वाली आग, हाथ भी जला देती है।
प्रेम को बड़ा होने के लिए समय चाहिए, और वो समय कॉलेज
की कैन्टीन भरपूर देती है।
मेरे कॉलेज की कैन्टीन के बाहर कुछ खाली जगह थी और उस
खाली जगह के आगे एक पार्क। मैं उस खाली जगह में बैठी थी और मेरी नज़रों के ठीक
सामने प्रशांत पार्क में बैठा अपने दोस्तों से बातें कर रहा था, उसकी तरह के लड़के गप्पे
नहीं लड़ाते, बातें करते हैं। मैंने दूर से उसे देखा, उसने भी मुझे दूर से
ही देखा। मेरा उसे दूर से देखना ऐसा था जैसे बदन में हो चुकी बहुत लंबी थकान पर अब
किसी दवाई का असर होना शुरू हुआ है, उसका मुझे दूर से देखना ऐसा था कि वह कह रहा
हो कि – “मैं जानता हूँ तुम्हारी थकान को लेकिन दवाई मैं कहीं रख कर भूल गया”
उर्मि मेरे साथ ही थी, प्रशांत और उसके दोस्त वहाँ से उठकर कैन्टीन की तरफ आने
लगे, उर्मि दी ने उसकी तरफ देखते हुए बड़ा लंबा – हाएएए! बोलना शुरू किया और अपना
चेहरा उसकी तरफ से मेरी तरफ घूमा दिया, मैंने झुँझलाकर अपना हाथ उर्मि के मुँह पर
रखते हुए कहा-
“पागल हो क्या यार!, मुझे ऐसे अच्छा नहीं लगता”
लेकिन इस बीच मैंने उसकी मुस्कान देख ली थी जिसने
मुझे जवाब दिया-
“मैं जानता हूँ तुम मुझे पसंद करती हो”
उर्मि ने मेरा हाथ हटाया और मुझपर झिड़की-
“बहन मुझे ही बात कर लेने दे उससे, अब तुझसे तो हो
नहीं रही, कम से कम उसे पता तो हो की तेरे मन में उसके लिए क्या है।”
जब जीवन में बहुत
लंबे समय से प्रेम नहीं मिला हो तो प्रेम के मिलने से पहले एक अजीब सा डर बना रहता
है,
“कुछ नहीं रखा प्रेम-व्रेम में और किसी को कुछ नहीं
बताना मुझे, चलो पी.जी. चलते हैं”
“हाँ भई, चलो पी.जी. लेकिन आगे से कोई पागलपन सहन
नहीं किया जाएगा तेरा समझी”
घर से दूर रहना
एक अलग जीवन में जीना होता है, हम वो सब महसूस करते हैं जो शायद घर रहकर कभी महसूस
नहीं कर सकते थे, पी.जी. में रहते हुए मेरे घर की स्थिति तब तक किसी
परदे के पीछे छुपी रहती जब तक मैं कल्पनाओं और भावनाओं में बहकर उसके विपरीत कोई
काम ना कर बैठूँ और जैसे ही मैं कोई ऐसा काम करती हूँ तो मेरे घर की स्थिति मुझे
पीछे से आकर धप्पा दे जाती जैसे हम कोई छुपम-छुपाई का खेल खेल रहे हों। इस धप्पे
के ठीक पहले तक मेरे मन में- ‘जो होगा देखा जाएगा भाव बना रहता’ और धप्पे के ठीक
बाद लगता-‘मैंने ये ठीक होते हुए भी ठीक नहीं किया’।
“यार क्या प्रॉब्लेम है तेरी, जब कहती हूँ बता दे बहन
मैडम चुप और वैसे कहती रहती हैं उसे बताना है सब कुछ, बड़े अलग ड्रामे हैं आपके”
“अरे बस यार, तुम तो जानती ही हो मुझे” मैंने एक
निराशा से भरी हंसी मुंह पर चिपकाई।
“बहन
तू खुद को ही नहीं जानती तो मैं क्या जानूँगी तुझे, कभी-कभी लगता है कि दो
ज़िंदगियाँ जी रही है और असल में तू खुद ही नहीं जानती कि उसमें से असली कौन सी है”
सच्चाई का थप्पड़
पड़ता धीरे से है लेकिन दर्द गोली जितना दे जाता है। मैं कुछ
नहीं बोल पाई, पी.जी पहुंचते ही हम दोनों अपने-अपने बेड पर चित पड़ गए। मेरा सिर
भारी हो रहा था, कुछ-कुछ आत्मग्लानि और खीझ जाने के बीच मैं थक कर गिर पड़ी थी। ऐसे
में नींद का आना स्वाभाविक था।
कई बार सपने सच बयान कर रहे होते हैं। मुझे मेरे घर
का सपना आया। घर ठीक वैसे ही डरा रहा था जैसे समाज मुझे डराता आया था। सपना क्या
था मुझे याद नहीं लेकिन उठने के बाद सबसे पहले मैंने डायरी उठाई और लिखा-
मेरा घर!
मेरा घर कभी नहीं था सुलझा हुआ,
सिवाय मेरे पिता की बाहें
मैंने कभी अपने घर में माँ के साथ खाना नहीं बनाया
कभी माँ ने मेरी चोटी नहीं बनाई
मुझे जल्दी घर आने को नहीं कहा
मेरी स्मृति में उन्होंने मुझे कभी गले नहीं लगाया
उन्होंने कभी नहीं बाँटे, मुझसे अपनी जवानी और बचपन
के किस्से
क्यूंकी वे मर चुकी थीं
संयुक्त परिवार के बावजूद मेरी स्मृतियों में केवल-
शोर,
लड़ाई-झगड़े, मार-पिटाई, डर घबराहट ,टीस , आँसू और एक
दबी हुई चीख मिली
जैसे ही घर मेरे पास आता, मैं घर से दूर भागती
मेरे घर में मुझे मुझे स्वयं के होने कि आजादी कभी
नहीं मिली
ढेर सारी हिदायतों के बीच मेरा दम घुटने लगता
मैंने मेरे घर में देखी शराब और बहुत शराब
मैंने ज़िंदा होते हुए भी मरे लोगों को देखा जिनके
भीतर असीमित प्रेम था
जो कभी पूरी तरह व्यक्त नहीं किया गया
मैंने देखे मृत अवस्था में शरीर
जिनमें सबसे अविश्वशनीय मेरे पिता का था
मैंने मेरे घर में देखा भावनात्मक संबंधों का अभाव
जिसने मुझे मेरे घर से दूर किया
लेकिन मुझे पैसों की कमी कभी नहीं हुई …..
मेरे हाथ से पेन ढीला पड़ चुका था, आँखों से बोझ हल्का
हो गया था। मैंने डायरी बंद की और चाय
बनाने के लिए रसोई में चली गई। चाय बनाकर मैं जब तक लौटी तो उर्मि उठ चुकी थीं,
मैंने उसे चाय का कप पकड़ाया और होंठों से हल्की सी मुस्कान ज़हीर की, उसके एक हाथ
में फोन में था, उनका मेरी गीली आँखों पर कोई ध्यान नहीं था, दूसरे हाथ से उसने चाय
ली और फिर अपने फोन में लग गईं। मैं अभी भी चुप थी बस चाय पी रही थी और दीवार ताक
रही थी, आजकल ऐसे लोगों का दीवार ताकना और चुप हो जाना इतने गुप्त तरीके से होता
है कि साथ वालों को कोई खबर नहीं लगती और जब तक वे बोलने कि स्थिति में आते हैं,
गीली आखें सूख चुकी होती हैं।
-----------------------------------------------------।।------------------------------------------------------------------जब तक वह सामने नहीं होता था तब तक
मैं उसे सारा जानती थी लेकिन जैसे ही वह सामने आता लगता कि उसे कितना जानना बाकी
है।
मैं और आईना आमने सामने थे –
“क्यूँ हो रहा है ये सब ?”
“क्यूँ नहीं होना चाहिए था ?”
“नहीं, मैंने ये तो नहीं कहा”
“तो फिर?”
“प्रशांत किसी और से प्यार करता है”
“तुम्हें कैसे पता?”
“बस पता है”
“तुम उससे प्यार करती हो?”
“हाँ बिल्कुल करती हूँ”
“तुम्हें कैसे पता कि तुम उससे प्यार करती हो?”
“मैं उसे जब भी देखती हूँ तो मुझे आज़ादी महसूस होती है, लगता है अब जाकर खुलकर
सांस ले सकती हूँ”
“तुम अपने घरवालों से ये आजादी क्यूँ नहीं मांगती ?”
“मैं आज़ाद तो हूँ, कॉलेज जाती हूँ, पढ़ाई करती हूँ,
थोड़ी बहुत मस्ती भी हो जाती है, घूम-फिर लेती हूँ तो और क्या माँगू उनसे ?”
“तो प्रशांत में तुम्हें कैसी आजादी नज़र आती है?”
“पता नहीं”
“तुम्हें प्यार प्रशांत से है या आजादी से?”
“बस करो, मुझे नहीं मालूम, मैं उससे प्रेम करती हूँ बस मुझे इतना पता है, ये क्यों
कैसे के सवालों में मुझे मत उलझाओ” मैं झल्ला उठी
“प्रेम
करना प्रेम हो जाने जैसा होता है, और तुम कभी आज़ाद नहीं हो सकती अगर तुम प्रेम में
नहीं हो”
मैंने गुस्से में पास में रखा वास आईने में दे मारा । समझ नहीं आया कांच टूटा या
कुछ और।
कांच के टूटने से उर्मि कमरे में दौड़ते हुए आई।
“ये कैसे हुआ?”
“वो चूहा ड्रेसिंग पर दौड़ रहा था बिल्कुल शीशे के सामने था, उसे भगाने के चक्कर
में उसपर वास दे मारा, वास सीधे कांच में जा लगा, मैं नया कांच लगवा दूँगी , आप
फिक्र मत करो”
“तुझे चोट तो नहीं आई न ?”
“नहीं नहीं, मैं बिल्कुल ठीक हूँ”
हवा कुछ देर के लिए रुक गई थी, घड़ी की सुइयां बंद पड़
गई थी, लेकिन एक सवाल बार-बार
दिमाग से किसी कीड़े कि तरह चिपक गया था जो लाख कोशिशों के बावजूद शरीर से दूर नहीं
हो पा रहा था-
“तुम प्यार प्रशांत से करती हो या आजादी से?”
गुज़रता वक्त हमेशा बेहतर होता है, आपको एक जगह बांध
कर नहीं रखता, वक्त गुज़रा और परीक्षा के लिए तैयारी भी शुरु हो गई थी। मैं अपना
ध्यान सिर्फ परीक्षाओं पर चाहती थी सो इंस्टाग्राम को फोन से हटाया, प्रशांत की तस्वीर को भी फोन
से डिलीट करने की कोशिश की लेकिन ये हो नहीं पाया। मैं अब अपने अतीत को वर्तमान
में रख कर काम करना चाहती थी, काम और ढेर सारा काम, हर वो काम करना चाहती थी जिसे
मैंने कभी नहीं सोच था कि मैं करूंगी। सारा दिन मैंने खूब पढ़ाई कि वैसे ही जैसे
पहले किया करती थी। परीक्षा 15 दिनों बाद थी, मैं 15 दिन तक वो
होती रही जो मैं नहीं होना चाहती थी। आज परीक्षा का दिन था लेकिन अतीत का बोझ इतना
भारी था कि वर्तमान की कोई सुध मुझे न थी न इस चीज का ख्याल था कि आज फिर प्रशांत से
मिलूँगी। मैं झुमके पहनना भूल गई थी। प्रशांत जैसे ही सामने आया तो अचानक से चौंक उठी। खुलेपन कि हल्की सी उम्मीद से
पिंजरे की घुटन अचानक से अपने आप बढ़ जाती है। उसे देखते ही मैंने एक लंबी
सांस ली, अंदर बहुत खलबली, कुलबुलाहट, थकान, आँसू, चीखें उठ रही थी। बस मैं अब और
सहन नहीं कर सकती थी, मैंने परीक्षा कैसे दी नहीं जानती, बस परीक्षा दे दी गई।
मैंने pg पहुंचते ही इंस्टाग्राम फोन में डाउनलोड किया और प्रशांत
की id को लाखों दफा देखा, सारा दिन उलझन में गुज़रा लेकिन रात
आते ही सब साफ दिखने लगा मैं अब अपने प्रेम को बयान करना चाहती थी, इसका अंजाम कुछ
भी हो सकता था लेकिन मैं बेखौफ होना चाहती थी सो मेरे कांपते हाथों ने बढ़ती साँसों
के साथ, दिल की धड़कनों के बेहिसाब होने के साथ उसे इंस्टाग्राम पर एक मैसेज भेज ही
दिया-
“कुछ कविताएं लिखी हैं तुम्हें सोचकर , पता नहीं तुम्हारी क्या प्रतिक्रिया होगी, किंतु
समझती हूं वो कविताएं तुम्हारे पास होनी चाहिए, आज जब मेरी request
ने तुम्हारा ध्यान नहीं खींचा तो लगा उन कविताओं को विराम दे देना
चाहिए और अंततः ये कविताएं तुम तक पहुंचनी चाहिए। यदि मेरे इन ख्यालों से कोई ठेस
पहुंची हो तो माफ़ी” उसका ठीक 4 घंटे बाद रिप्लाइ आया -
“मैं देखना चाहूँगा आपने मेरे लिए क्या लिखा है”
मैंने एक सांस भरकर वो सारी कविताएँ उसे भेज दी जो
उसे सोचकर लिखी गई थी।
“जब भी हृदय में तुम्हारे लिए प्रेम उमड़ा है,
वह स्वतंत्र नहीं होता
उसके साथ आता है भय,बेचैनी,
बहुत से सवाल,कुछ तुमसे कुछ खुद
से
मुझे परेशानी इन भावों से नहीं
किंतु विभाव से है
मैं चाहती हूं विभाव केवल स्वतंत्र भाव उपजे और
मेरे हृदय में विचलन के विपरीत स्थायित्व हो
कैसा होगा एक जगह बंद रहकर स्वतंत्र होना,
कैसा होगा तुम्हारे प्रेम का स्वतंत्र होना?
तुम्हारे दाहिने बाजू के बराबर मेरे दाहिने बाजू का
होना
मन में दुख उत्पन्न करता है
और सवाल करता है
क्या हम विपरीत की जगह एक दिशा में नहीं चल सकते?
क्या तुम्हारा प्रेम स्वतंत्र नहीं हो सकता?”
“उम्मीद है ये कविता केवल आप तक सीमित रहे”
उसका जवाब ठीक 16 घंटे बाद आया, ये 16 घंटे ठीक वैसे थे जैसे कोई पंछी
अपनी होने वाली आजादी से बेहद खुश हो लेकिन अभी तक वो कैद में बंद हो, ये 16 घंटे
वैसे थे जैसे मुझे प्लेटफॉर्म पर पहुँचने
में देरी हो रही है और ट्रेन छूट जाने का डर लगातार बना हुआ है। मैं
ठीक उसी तरह बैचेन थी जैसे उससे कोई आखिरी किया गया वादा मैं पूरा नहीं कर पा रही
थी।
“आपकी कविता पढ़कर मुझे लगता है कि आपकी भावनाएँ मेरी
तरफ निर्देशित हैं, मैं आपकी भावनाओं का सम्मान करता हूँ लेकिन मेरे जीवन में " मेरे जीवन में
एक खूबसूरत लड़की है , मैं
उससे प्यार करता हूँ |"
हम अक्सर चीजों के गुज़र जाने के बाद उन्हें बेहतर
समझते हैं, मुझे
भी उसके लिए प्रेम की स्पष्टता तब हुई जब उसने उस मैसेज में मुझसे कहा कि -
" मेरे
जीवन में एक खूबसूरत लड़की है , मैं उससे प्यार करता हूँ |"
ये पढ़ते ही मेरे ह्रदय में अजीब सा दर्द उठा , मन खालीपन से
भर गया , नयन
आंसुओं से भीग गए और गले में एक चीख उठ रही थी जो दब गयी लेकिन कहीं न कहीं लग रहा
था कि ये तो होना ही था, अब
दुखी होके क्या फ़ायदा ? उस दिन
हमारी कंप्यूटर ग्राफ़िक्स की परीक्षा थी, और चंद घंटों पहले उसके इस मैसेज ने मेरे दिमाग
को बेसुध सा कर दिया था ,
लेकिन उसे
आज फिर कक्षा में बैठा पाउंगी , मुझसे ज़्यादा दूर न होते हुए भी बहुत दूर, मुझे डर लग रहा
था कि कहीं मैं रो न पडूँ उसे मुझसे दूर जाता हुआ देखकर| मैंने वो
दिन डायरी के रूप में संजो लिया पता नहीं क्यों? शायद आप अपने दुख को सहेजकर रखना चाहते हैं ताकि जरूरत पड़ने
पर उसे पलटकर देख लिया जाए। मैंने लिखा -
मैं तुमसे पहले जाकर अपनी सीट पर बैठ चुकी थी , तुम्हारे आने
से ठीक ३ मिनट पहले
मेरी
आंखों से आंसू बह चुके थे जिन्हें और बहने की इजाज़त मैं नहीं दे रही थी, जैसे ही तुम
कक्षा में प्रविष्ट हुए, मैं
अपनी नज़रें तुमसे चुरा चुकी थी, तुम कब अपनी सीट पर आकर बैठे पता नहीं चला| कितनी अजीब बात
है, तुम
कभी मेरे हिस्से में नहीं थे किन्तु तुम्हारे मेरे जीवन में न होने का एहसास काफी
नुकसानदायक लग रहा था | मैं
पीछे बैठी बस तुम्हें चंद पलों के लिए देखे जा रही थी, कि अब मेरे
जीवन में कितना खूबसूरत एहसास नहीं रहेगा| मुझे घुटन महसूस हो रही थी।
मैं कुछ महीनों तक प्रशांत की दुनिया से नहीं लौटी या
ये कहूँ कि कुछ महीनों के लिए प्रशांत मेरी दुनिया में वैसे ही बना रहा जैसे कोई
नींद में बेचैन कर देने वाला सपना। फिर एक दिन उर्मि ने मुझे कस के डांट लगाई –
“उस इंसान के पीछे अपना समय बर्बाद करना कितना बेकार
है जो तुम्हें प्यार नहीं करता”
“लेकिन मैं तो उससे करती हूँ”
“हे! भगवान लेकिन उसकी ज़िंदगी में कोई और है”
“अच्छे से जानती हूँ, लेकिन फिर भी अपनी भावनाएँ उसके
लिए रोक नहीं पा रही हूँ, रोकना चाहती हूँ लेकिन फिर भी.....ये सब मेरे बस का नहीं
है दी”
“बस का नहीं है तभी कह रही हूँ उसके बारे में सोचना
बंद कर और खुश रहा कर, ये क्या सारा दिन अजीब सी शक्ल बनाए रखती है”
“मैं
भी ये सब नहीं चाहती थी, कई बार तो खुद से ग्लानि होने लगती है, खुद से शर्म आने
लगती है कि न मैंने उससे कभी इजाजत ली न मैंने कभी उसके मन को जाना, उसके बारे में
न के बराबर जानते हुए भी मैंने उसे अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बना लिया और अब जब उसने
कह दिया है मैं उसके लिए कोई नहीं हूँ तो ये बातें मुझे क्यूँ चुभ रही है? उसने
कभी मुझसे बात तक नहीं की फिर भी उसे अपने से अलग नहीं कर पा रही हूँ... मैं क्या
करूँ ?”
“तू शांत होजा और ये सब बेकार की बातें कहाँ से आती
हैं तेरे दिमाग में?”
ऐसे मौकों पर दोस्तों का होना ज़रूरी होता है ताकि पता
चल सके कि दुख बांटने से हल्का हो जाता है।
परीक्षा समाप्त हो गई थी और अब मुझे ये शहर छोड़ कर
जाना था... क्यूंकी p g भी तो कॉलेज कि वजह से ही लिया था
तो अब कॉलेज खत्म तो p g भी खत्म और शायद ये कहानी भी ...
मेरी उसके शहर में आखरी रात थी, सारी रात मैं सो नहीं पाई ... गुजरती हुई रात में
हर पल ऐसा लगता कि अगले कि पल उसका कोई मैसेज या फोन आ आएगा और हमारी एक नई कहानी
शुरू होगी...लेकिन रात भर में उसकी तरफ से कोई संकेत तक नहीं आया, पता नहीं क्यूँ
फिर भी एक अजीब सा विश्वास दिल में घर कर गया था कि आज नहीं तो कल सही, हम साथ
होंगे शायद किस्मत किसी खास वक्त के इंतज़ार में है और मैंने भारी आँखों के साथ
आसमान को सूरज के उगने से ठीक पहले देखा, सूरज के उगने से ठीक पहले कि लालिमा में
ये निश्चय होता है कि सूरज उगेगा ही शायद उसी लालिमा ने मुझे भरोसा दिया और मैंने
कलम हाथों में ले ली, शायद मैं अपनी किस्मत लिखना चाहती थी-
तुम्हारे शहर में आखिरी घंटे बीता रही हूं,
लेकिन हमेशा के लिए नहीं,
शायद कुछ सालों के लिए
कुछ सालों के लिए मैं,तुम शायद न
मिलें
लेकिन शायद हमारी बातचीत हो
शायद एक नया हिस्सा शुरू हो ज़िंदगी का
जिसमें तुम हो, मैं होऊं और हमारी
प्यारी सी कहानी
शायद हम किसी बेहतर जगह पर साथ हों
हम किसी बेहतर घड़ी की तलाश में हों
लेकिन मैं फिर आऊंगी तुम्हारे शहर
तुम्हारे साथ ही,
आज मैं तुम्हें लेकर जा रही हूं
फिर तुम मुझे लेकर आओगे,
तुम्हारे शहर।
शहर यूँही यादगार नहीं रहते शहर के लोग उसे यादगार
बनाते हैं फिर चाहे वो याद कड़वी हो या मीठी, मेरे लिए उसका शहर दोनों ही था- कड़वा
भी और मीठा भी लेकिन अब जाना था सो जाना था लेकिन मैं लौट आने के लिए जाना चाहती थी। जब मैंने
उसका शहर छोड़ा तो आँखों में अनायास ही आँसू थे। खैर, अब मुझे दिल्ली जाना था,
यूट्यूब से जितनी जानकारी ली जा सकती थी, उतनी लेकर मुझे दिल्ली जाना ठीक लगा। लेकिन
यह बात पहले घर और घरवालों को पता होनी चाहिए। मैंने घर जाने के लिए सारा सामान
सुबह ही बाँधा थ, रात को मुझमें ऐसा कुछ भी करने कि क्षमता नहीं थी या यूं कहूँ कि
मैं ऐसा करना नहीं चाहती थी। मैं 10 बजे बस अड्डे पर पहुँच चुकी थी, बस 10:15 पर
चली और मैं अपनी सीट पर बैठी हुई भी नहीं बैठी थी, बस चलने के साथ जैसे ही हवा ने
मेरे चेहरे हो सहलाया आँसू निरंतर हो गए वो सब बहने लगा जो भीतर दबा हुआ था। मैं
आस-पास के लोगों को नहीं देखना चाहती थी सो आँखें बंद कर ली लेकिन आंसुओं को मैंने
नहीं रोका लेकिन सुबकियाँ भी नहीं आने दी। सब कुछ इतनी सरलता से बह गया जिस सरलता
से उसने कहा था- “मैं उससे बहुत प्यार करता हूँ”।
एक घंटे के सफर में कॉलेज के 3 साल बीत गए थे। अब सब
कुछ नया शुरू करना था, नए सिरे से।
2
नए सिरे से
शुरू करने में भी बहुत कुछ पुराना हम हमारे साथ लेकर चलते हैं।
मैं अपने घर के सामने पहुँच चुकी थी। मुझे कुछ 1
हफ्ता घर रहना था उसके बाद पढ़ाई के सिलसिले में दिल्ली जाने का मन बना चुकी थी।
मेरे घर की दीवारें मुझसे बात किया करती थी। उनकी बातें मुझे विचलित किए बिना नहीं
रहती, मैं भी उनकी बातें सुनना तो चाहती थी लेकिन उन बातों ने कभी मुझे संतोष नहीं
दिया। मैंने अपने घर का ताला खोला। जब ताला हाथों में था तो बहुत पुराना नहीं लग रहा था, लेकिन ताला घर को
मुझसे पहले से जानता था। मेरे और ताले के बीच संवाद में हमेशा वो मुझसे एक
ही सवाल करता-“कब तक मुझे दरवाज़े पर लगाकर गलियों को ताकना पड़ेगा? मैं घर के अंदर
जाना चाहता हूँ, मुझे घर के आँगन की मुंडेर पर पड़े रहकर घरवालों के संवाद सुनने
हैं। मैं बंद नहीं होना चाहता, मैं चाहता हूँ कि मैं अपनी चाबी हमेशा मूँह में लिए
सबको दिखाता फिरूँ।” मैं ताले को असमर्थता के भाव से देखती और उसे खोल देती। घर
में प्रवेश करते ही अजीब सी हवा मुझे घेर लेती, हर तरफ से मुझे सवाल उपजते नज़र
आते। वे सवाल घर की दीवारों, पंखों, कमरों, रसोई, गुसलखाने, छत से उपजते और हवा
में घुलकर मेरे सिर पर ज़ोर से वार करते। मुझे सांस लेने में तकलीफ होने लगती लेकिन इस तकलीफ में
अपनापन था, इसमें नाराजगी थी मेरे घर की जो मुझसे उम्मीद लगाए बैठी थी कि – मैं
उसे उजड़ने से बचा लूँगी। मैं अपराध भाव से हर कोने से नज़र चुराती, सामान
बेतरतीबी से फेंक मैं धम्म से बिस्तर पर जा गिरी। बिस्तर की धूल हवा से ज़्यादा
मेरे दिमाग में घूस चुकी थी। इस
धूल में अतीत मेरी आँखों के सामने नाच रहा था। इस नाच से मेरी आँखें धुंधला
रही थी। अंत में धूल का एक बड़ा गुब्बार आया और मुझे चित कर गया। मैं गहरी नींद में
जा चुकी थी। जब आँख खुली तो सब कुछ शांत हो चुका था। हर तरफ सिर्फ सन्नाटा था। मैं
बिस्तर से उठी और अपने लिए चाय बनाई। चाय पीने के बाद मैं घर को जितना साफ कर सकती
थी उतना किया। उसके बाद नहाई और फिर चाचा जी के घर चली गई जो मेरे घर से 2 गली दूर
था। चाचा जी वैसे चाचा जी नहीं थे जो रिश्ते न निभाने वाले तबके से आते थे, वे
बहुत ही सहृदय और उदार थे किन्तु जितनी चादर समाज आपको सुरक्षित होने के ढोंग में
उढ़ा देता है उतनी ही वे भी ओढ़ चुके थे।
“नमस्ते चाची जी”
“नमस्ते बेटा नमस्ते, आ गई?”
“हाँ”
“ठीक-ठाक था सफर, कोई परेशानी तो नहीं हुई ?”
“ना-ना चाची जी”
“चलो बढ़िया है, मैं खाना बना देती हूँ, तुम थक गई
होगी”
मैंने बस मुसकुराते हुए सिर हिलाया
मैं चाची के पास बैठ गई, वे रोटी बनाने लगीं। मैं
उन्हें रोटी बनाता देख रही थी। मैं उनसे कई बार पूछना चाहती कि कैसा लगता है उन्हें मेरी जिम्मेदारी
उठाना? क्या वे इस संबंध में केवल इसलिए हैं
कि उनके पति के भाई की मृत्यु हो चुकी है?’ मैं ये जानती थी कि उन्होंने
कभी मेरा बुरा नहीं चाहा लेकिन आज यदि मेरे पिता होते तो शायद मैं अपने घर रोटियाँ
खा रही होती। भावना चीज़ ही ऐसी है, पुराने को जल्दी से छोड़ नहीं पाती, नया अपनाने
से लाख डरती है।
मैंने वहीं बैठे-बैठे खाना खाया, जितने सवाल उन्हें
पूछने चाहिए थे, वे पूछ चुकी थीं और मैं भी इससे ज़्यादा कुछ भी बताने से बचती ही
थी। मैं शाम तक अपने चाचा के घर थी, 7 बजे मैं अपने घर कोई बहाना बनाकर लौटी। मुझे
कभी-कभी ये अजीब लगता कि मैं उनसे ये नहीं कह पाती थी कि मुझे अपने घर क्यूँ जाना
है। लौटकर मैंने वो तमाम तस्वीरें खंगाली जिनमें से लोग झाँकर मुझे देखते रहते हैं
और मैं अपने दर्द को ढकने की तमाम नाकाम कोशिशें करती रहती हूँ, अंत में जब मैं
रोने लगती हूँ तब भी वे लोग झाँकते हुए हँसते रहते हैं लेकिन उनकी आँखें भी भीग
जाती हैं। ऐसा प्रतीत होता है तस्वीर वाला इंसान भी मेरे साथ रोने लगा है।
ये कितना अजीब है कि आप किसी के साथ बहुत लंबा और
खूबसूरत वक्त गुज़ारो और अचानक से ये एहसास हो कि वो इंसान अब इस दुनिया में नहीं
है। ऐसा लगता है कि तस्वीरें झूठ बोल रही हैं। जो लोग चले जाते हैं, हम उन्हें कभी अपने से अलग नहीं कर
पाते, हम हमेशा उन्हें साथ लेकर चलते हैं और साथ लेकर चलते हैं अतीत की लाश।
मैं पूरी रात उन तस्वीरों से बात करती रही, अब घर मुझसे सवाल नहीं कर रहा था, मेरे शरीर से तड़प की लपटें उठने
लगी थीं, मेरी आँखों से खून बह रहा था और दीवारें मेरे आंसुओं से धुंधली
दिखाई देने लगी थी। अब घर मेरे सामने बुत बन कर था और मेरी ऊर्जा का एक-एक कण उसपे
सवाल पे सवाल दागे जा रहा था। कुछ देर के बाद मैंने घर को समेटा और घर ने मुझे और
हम एक दूसरे की गोद में सिर रख कर कब सोये, पता नहीं।
सुबह उठी तो आँखें सूजी हुईं थी, सिर भारी था,
तस्वीरों को समेटने के बाद मैंने अपने लिए चाय बनाई।
जब तक मैं घर रही मैंने खाना चाचा जी के यहाँ ही
खाया। शाम तक उनके यहाँ ही रहती और रात को सोने के समय अपने घर चली आती। सुकून
केवल अपनी जगह ही मिलता है दूसरी जगह चाहे कितनी भी अच्छी हो। 1 हफ्ता अपने यथार्थ के साथ जीने
पर सारी कल्पना धुंधली पड़ गई। प्रशांत मेरे मस्तिष्क में केवल क्षणिक विचार की
भांति आता और फिर लौट जाता। इन सात दिन में मैं फिर से अपने जीवन के 20
वर्ष जी चुकी थी। हफ्ते की आखिरी शाम को मैं, चाचा जी और चाची जी साथ बैठ चाय पी
रहे थे और मेरे भविष्य को लेकर तमाम संभावनाएँ एक दूसरे को बता रहे थे। वो सब कुछ
जो घटना चाहिए उनकी बातों में शामिल था और वो जो मैं चाहती थी कि मेरे जीवन में
घटे, मेरे विचारों में। चाचा-चाची
जी ने हमेशा मुझे वो प्रेम दिया जो शायद दुनिया के बाकी बच्चों को नहीं मिलता
लेकिन हमारे वैचारिक अंतराल के कारण मैं कभी उनसे भावनात्मक संबंध नहीं बना पाई।
अंत में यह तय हुआ कि मुझे सरकारी नौकरी की तैयारी करने दिल्ली जाना चाहिए। मेरा
भी यही मन था। मैंने उनसे कहा कि मैं कल ही दिल्ली के लिए रवाना हो जाऊँगी
उन्होंने भी रुपये-पैसे के खर्च की चिंता न करने को कहा। मैं दिल्ली जाने से एक
रात पहले अपने घर की छत को ताक रही थी कि तभी छत सुलगने लगी, दीवारें जल उठीं,
मेरे नयन जल ने उस दहकती आग को रोकना चाहा लेकिन मेरी देह जलने लगी, नयन जल में
अग्नि प्रवेश कर गई और सब कुछ जल उठा। आज ना मैं घर से सवाल कर रही थी और ना ही घर मुझसे, आज मैं और घर एक हो गए
थे। हमारे एक होने में वे तस्वीरें भी जल उठी और उनसे आँसू बहने लगे। सब कुछ सारी
रात जलता रहा और सुबह मायूसी ने आकर मुझे जगाया ताकि घर एकांत में रह सके।
मैंने सुबह अपना सामान पैक किया और चाचा- चाची जी को नमस्ते कह दोपहर में दिल्ली
जाने वाली बस में चढ़ कर रवाना हो गई। मैं जब घर से निकली थी तो घर को मुड़ कर देखने
की हिम्मत नहीं जुटा पाई। शायद घर ने भी मुझे जाते हुए ना देखा हो। बस ताला मुझसे
नाराज था।
बस में बैठ सामान के साथ घर मेरे साथ चल रहा था पर घर
का बोझ अब प्रशांत उठा रहा था। मैं उसके साथ रास्ता पार कर रही थी तो सामान कम
भारी लग रहा था। 4 घंटे का सफर चुप-चाप गुज़र गया। सामने दिल्ली था और पीछे खड़े थे
घर और प्रशांत। मैंने लंबी सांस ली। सफर अकेले शुरू करना था तो मैं आगे बढ़ गई, घर
और प्रशांत मुझसे 4 कदम पीछे थे। मैं पीछे मुड़ी और उन्हें एक दफा जी भर के देखा।
आँखों से आँसू झलक आए। मैं आगे जा रही थी वे दोनों पीछे चलते जा रहे थे, शायद कई
बार लोगों का पीछे चले जाना ज़्यादा ज़रूरी हो जाता है। मैं थक गई थी सो एक कैफै में
जाकर बैठ गई। मैंने 1 घंटा कैफे में बिताया, इस बीच मैंने चाय पी और कमरा ढूँढने
के लिए ब्रोकर को फोन किया। ब्रोकर ने कहा वह आधे घंटे में उसी कैफे के पास आ जाएगा।
आधे घंटे बाद वह आया और दिल्ली के तमाम कमरे खंगालने के बाद एक ठीक-ठाक सा कमरा
मुझे मिल गया जिसका किराया भी ठीक ठीक-ठाक था। मैंने पैसे जमा किए और करीने से
लगाने के लिए अपना सामान खोला। मुझे कुछ 3-4 घंटे लगे, रात तक सब काम निपट चुका था
अब बस एक लाइब्रेरी की ही तलाश थी जो पास में ही हो। रात को खाना बाहर ही खाया और
रात को घरवाले से बात करके सो गई। सुबह-सुबह मैंने चाय दिल्ली की टपरी पे ही पी।
दिल्ली की टपरी पे बात तो अलग है। सुबह-सुबह वे सारे अभ्यर्थी नज़रों के सामने होते
हैं जो यहाँ कुछ नहीं ले कर आए थे लेकिन यहाँ से बहुत कुछ ले जा सकते थे। कुछ
चेहरों पे उत्साह था, कुछ पे थकान और कुछ पे मायूसी। चाय पीने के बाद मैं सबसे
नजदीकी लाइब्रेरी में चली गई। दिल्ली में मेरा कोई दोस्त नहीं था और न ही मैं कोई
दोस्त बनाना चाहती थी लेकिन दिल्ली मुझे अजनबी भी नहीं लग रही थी। कॉलेज के दिनों
में ही घर से बाहर किसी दूसरे शहर में रहने के कारण मुझे सभी शहर एक जैसे ही लगते।
कम से कम जिस शहर में विद्यार्थियों की भरमार हो वे तो एक जैसे ही होते हैं। बैग
उठाए विद्यार्थी हर दूसरे कदम पे दिख जाएंगे। 3 कदम की दूरी पे कोई लाइब्रेरी,
कोचिंग सेंटर या कोई कॉलेज। मैं दिल्ली यूपीएससी की तैयारी के लिए आई थी सो
किताबें पहले से खरीद लाई थी। मेरा सारा दिन लाइब्रेरी में बीता। सुबह से चाय के
अलावा कुछ नहीं खाया-पिया। पूरा दिन यूपीएससी कि तैयारी कैसे करनी है इन्ही
वीडियोज़ को देखते-देखते ही निकाल गया लेकिन समझ कुछ नहीं आया कि कहाँ से शुरू
करूँ। खाने का भी इंतज़ाम करना था सो ब्रोकर से मदद की उम्मीद में उसे फोन लगा
दिया। उसने टिफ़िन सर्विस वालों का नंबर दे दिया जिससे खाने का इंतज़ाम हो गया। रात
को बाहर से ही खाना खाया और करीब 11 बजे मैं सो गई।
पहला कदम आमतौर से मुश्किल ही होता है।
यूपीएससी के संसार में अनिश्चितता आपको हर दूसरे मोड़ पे खड़ी दिखाई देगी। जब 2-3
दिन तक सब मेरे सिर के ऊपर से जा रहा था तो मेरी लाइब्रेरी की सीट के बगल में
बैठने वाली लड़की से मैंने हल्की-हल्की बात-चीत शुरू की। व्यक्ति चाहे कितना भी
कोशिश करले बिना बातचीत और दोस्ती के कहीं भी नहीं रह सकता। मेरा भी किसी को दोस्त
न बनाने वाला भाव जाते ही जा रहा था। वैसे भी जीवन में सहजता बनी रहनी चाहिए, यदि
आप बिल्कुल तटस्थ और कठोर हो जाएंगे तो निर्जीव हो जाएंगे। बात-चीत के साथ ये भाव
भी प्रबल था कि बेटा संभल के रहना आजकल दुनिया में न जाने कैसे कैसे लोग रहते हैं।
लाइब्रेरी में बात कर नहीं सकते थे तो मैंने फुसफुसाते हुए केवल इतना पूछा आप भी
यूपीएससी कर रहे हैं ? सामने से बस मुंडी हिला दी गई। मैंने फिर फुसफुसाते हुए कहा
कि- “मुझे आपकी हेल्प चाहिए, फ्री होके चाय के लिए चलें?” इस बार मुंडी हिलाने के
साथ साथ वे मुस्कुराईं। वे करीब 3 घंटे तक पढ़ती रहीं और मैंने वक्त गुजारने के लिए
तब एक फिल्म लाइब्रेरी में बैठे बैठे ही खत्म कर दी। 3 घंटे बाद उन्होंने अपनी
कोहनी मारते हुए बाहर चलने का इशारा किया। हम दोनों लाइब्रेरी से निकल गए और पास
की एक चाय की दुकान पर चले गए। चाय की दुकान इतनी दूर नहीं थी कि रास्ते में वे
कुछ मुझसे पूछ सकें। बेंच पर बैठते-बैठते ही उन्होंने कहा-
“पूछो भई क्या पूछना है”
“वो दीदी, यूपीएससी के इग्ज़ैम के लिए थोड़ा गाइड कर
देते तो... ”
“देखो भई, पहले तो दीदी मत बुलाओ, मेरा नाम है जीनी,
अभी शुरू ही किया है?”
“हाँ दी...अ...जीनी”
“तो बिल्कुल भी नहीं पढ़ा है अभी तक?”
“नहीं, बिल्कुल भी नहीं”
“कहाँ से हो?”
“मैं हरियाणा से और आप?”
“मैं नोएडा ....भैया 2 कप चाय”
“कितने साल हो गए आपको यहाँ?”
“ये तीसरा साल है”
“कोई अटेम्प्ट दिया आपने?”
“हाँ एक दिया था पिछले साल, प्री हो गया था, मेंस में फिर मार खानी पड़ी”
इस बात पर मैंने सिर्फ सिर हिला दिया। किसी की असफलता पर कैसी
प्रतिक्रिया देनी चाहिए ये ना हमें कोई स्कूल सिखाता है, ना परिवार वाले, ना दोस्त
और ना ही समाज। उन्होंने मेरी असहजता को भांप लिया और बात को आगे बढ़ाया-
“तुम बताओ, कहाँ तक पढ़ाई की है?”
“अभी बस ग्रैजवैशन पूरा हुआ है”
“अरे, फिर तो बच्चे जागरूक हो रहे हैं जल्दी ही आ गई तुम तो” उन्होंने ये बात
हँसते हुए कही।
“हाँ बस ऐसे ही”
चाय आ चुकी थी। इतनी बात होने के बाद भी मैं पूरी तरह
सहज नहीं हो पाई थी। संकोच के मारे मैंने चाय का कप हाथ में उठा लिया। दिमाग में
आया कि ये लड़की मेरे जीवन के निजी पक्ष में ज़्यादा घुसने का प्रयास न ही करे तो
अच्छा इसलिए मैं तपाक से बोल उठी-
“तो बताओ ना तैयारी कैसे शुरू करूँ?”
उसने जैसे ही मेरी तरफ देखते हुए जवाब देना शुरू किया ऐसा लगा कि पुलिस ने चोर को
देख लिया है लेकिन पुलिस नहीं जानती कि चोर उसके सामने है। उसने आधे-पौने घंटे तक
मुझे तैयारी करने के गुर सिखाए और मैंने एक-एक बात ध्यान से सुनी। मैं कुछ हद तक
संतुष्ट हो गई थी। अंत में उसने कहा-
“इसी लाइब्रेरी में आओगी न तुम पर्मानेंट? कोई दिक्कत
हो तो फिर पूछ लेना”
“हाँ-हाँ जरूर”
“तो अब लाइब्रेरी या कहीं और?”
“आज के लिए काफी यूपीएससी हो गया, अभी तो रूम पे जाके सोऊँगी, कल से करती हूँ
शुरू”
ओके बाय कहकर वे उठी और लाइब्रेरी चल दी।
एक ही परीक्षा की तैयारी कर रहे विद्यार्थियों का एक
अलग समूह होता है जिन्हें हमेशा लगता है कि दूसरी परीक्षा की तैयारी कर रहे
विद्यार्थी उनसे अलग हैं, इसलिए विपक्ष समूह कभी उनकी मनःस्थिति को नहीं समझ सकता।
अपने गुट के विद्यार्थियों में कोई अपनापन तो जरूर होता है। मैं वापिस रूम में आ
गई थी। मेरी कुछ देर फोन पे चाचा जी से बात हुई और उसके बाद मैंने डायरी खोलने का
सोचा नहीं था डायरी अपने आप खुल गई। शाम के 6 बज रहे थे, पता नहीं किसने मुझसे
लिखवाया-
मैंने जब भी चाहा कि अपनेपन की हवा मुझे छूकर निकले,
हवाओं ने अपना रुख बदल लिया,
मैंने जब भी चाहा सिर पर कोई हाथ,
वो हाथ कभी मौजूद नहीं हुआ
मैंने जब भी खाली पाया अपना हृदय,
उसे भरने के लिए वहां कोई नहीं था
मैंने जब भी खुद को आज़ाद किया,
अकेलेपन ने तब तब आकर हृदय में दस्तक दी
मैंने जब भी चाहा प्रेम, प्रेम वहां मौजूद नहीं था
हमेशा से थी तो बस एक उम्मीद,
जो शायद अब नहीं रही।
मैंने ऐसा क्यों लिखा मुझे स्वयं मालूम नहीं। इतना
लिखने के बाद मेरे हाथों ने अपने आप डायरी के पन्ने उलटने शुरू किए। मेरी आत्मा ने
मेरे अतीत को फिर से देखा। अतीत ने मुझे अपने भीतर खींच लिया। अतीत वर्तमान जैसा
हो गया था। सभी भावनाएँ जीवंत हो उठीं।
पूरा घर लोगों से भर हुआ है, मेरे पिता आराम से सो
रहे हैं लेकिन इन सब लोगों के बीच क्यूँ? उनका चेहरा मुझे दिखाई नहीं दे
रहा...उनके चेहरे पर ये सफेद चादर क्यों है? पापा मर गए? नहीं पापा चले गए। लेकिन
कहाँ? पता नहीं। ऑफिस तो नहीं गए, गए होते तो यहाँ लेटे नहीं होते। तो अब जहाँ गए
हैं वहाँ से कब आएंगे? पता नहीं। ये लोग इतने मुरझाए चेहरों के साथ क्यों खड़े हैं?
चाचा जी... क्या हुआ? “बस अब संभल के रहना बेटा” ये सब लोग मेरे सिर पे हाथ क्यों रखे
जा रहे हैं? ये सबकी नज़र मेरी तरफ क्यों है? पापा... पापा... पापा उठ क्यों नहीं
रहे? ये चादर हटाओ कोई...ये चादर इतनी भारी क्यों है? क्या इसने सब कुछ ढक लिया?
मैं कहाँ हूँ? यहाँ तो नहीं हूँ... तो फिर कहाँ? पापा अभी तो लेटे थे... वो जा कहाँ रहे हैं? वो चल के क्यों नहीं
जा रहे? मैं उन्हें रोक क्यों नहीं पा रही? मैं चीख रही हूँ वो सुन क्यों नहीं
रहे? ये लोगों का झुंड मुझे धुंधला क्यों नज़र या रहा है? ये कुछ अजीब हो रहा है...
मैं रो क्यों नहीं रही हूँ? पापा सच में चले गए क्या? किससे पूछूँ? सन्न ... मैं
बिल्कुल सन्न हूँ... मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा, पापा मुझे देख क्यों नहीं रहे? वो
देख तो रहे हैं लेकिन मेरे पास क्यों नहीं आ रहे? पापा यहीं तो है... गए कहाँ है?
अरे अभी तो उनसे बात हुई थी... नाराज हो गए लगता है... कोई बात नहीं मना लूँगी...
अभी पापा कहाँ हैं? अरे ऑफिस गए हैं... शाम तक आ जाएंगे।
मेरी सांसें फूल रहीं थी, मेरे कांपते हाथों ने ज़ोर
से डायरी को बंद किया। हाथों ने डायरी को ज़ोर से कस लिया, घूटने अपने आप मुड़ गए,
घुटनों ने सिर को खींच लिया, डायरी मेरे हाथों में जकड़ सी गई थी, एक शांत चीख गले
से निकली और सारा शरीर जैसे अपने पर ही ज़ोर लगा रहा था, मेरा दिमाग सन्न हो गया,
आँखें अपने आप बंद हो गईं, शांति ... कितनी शांति थी वहाँ... मैं जैसे कहीं और
पहुँच गई थी। मैं वहाँ से लौटना नहीं चाहती थी... सब तो थे वहाँ- मैं, पापा, माँ,
घर... सब बहुत खुश थे...कुछ क्षण के बाद मैं वहाँ से लौट आई, कैसे पता नहीं। क्यों?
पता नहीं। उसके बाद अपने आप आँख लग गई और जब आँख खुली तो सुबह हो चुकी थी।
सूजी आँखें बीती रात के घाव लिए होती हैं। मैं
नहा-धोकर, खाना खा कर लाइब्रेरी चली गई। जीनी वहाँ पहले से ही बैठी थी। वह मुझे
देखकर मुस्कराई और मैं भी। सारे
मानसिक और भावनात्मक तनावों के बीच आप काम कभी नहीं छोड़ सकते। मैंने 3 घंटे
लगातार पढ़ाई की। जीनी भी 3 घंटे से अधिक पढ़ाई कर चुकी थी सो स्वाभाविक ही हम दोनों
‘टी ब्रेक’ के लिए चल दिए। हम जब हमारी वाली टपरी पर बैठे तो वहाँ पहले से ही एक
लड़का बैठा हुआ था। मैंने उसका चेहरा नहीं देखा लेकिन जीनी उसके साथ पूरी फ्रैंक
थी।
“हे डूड! कैसे हो?”
“मैं बढ़िया जीनी जान, तुम बताओ कैसी हो? मन तो नहीं टूटा मेरे जाने से?”
“ओह नो! शिवि... तुम भी कहीं भी चालू हो जाते हो”
“भैया 2 कप चाय” मैंने वहीं खड़े होकर चाय के लिए भैया
से कह दिया
“अरे इससे मिलो, ये है उमा अभी-अभी आई है दिल्ली कुछ
ही दिनों से यूपीएससी करने”
“मतलब यूपीएससी ने नया बकरा फंसा ही लिया, हैलो मैम”
मैंने संकोच और अजीब से संशय से जीनी को देखा और फिर
शिवि की तरफ देखकर ‘हैलो’ बोल दिया। जीनी ने फिर मेरी तरफ देखकर कहा –
“ये शिवांश है, यहीं दिल्ली मिला था 2 साल पहले, इसका
भी प्री हो चुका है एक बार, अबकी बार देखते हैं क्या गुल खिलाते हैं मिस्टर शिवि”
“ओके” मेरा ओके बस सामान्य सा ही था
2 की जगह 3 चाय अपने आप आ गईं और मैं इन दोनों
दोस्तों के बीच चाय के खत्म होने तक घुल-मिल चुकी थी।
“वैसे उमा तुम रहती कहाँ हो?”
“मैं, यहीं 2 गली छोड़ के मंदिर से अगले मकान 115 में”
“वो हनुमान मंदिर के पास जो घर हैं वहाँ?”
“हाँ”
“मतलब तुम तो मेरी पड़ोसन निकली भई, मैं 116 में हूँ”
“मतलब तुम दोनों की दोस्ती तो भगवान भी करवाना चाहता है” जीनी की हंसी ठीक वैसी ही
थी जब दोस्त आपके पीछे वरमाला लिए खड़े होकर हँसते हैं
“पागल है क्या, तू भी कहीं भी अपने वाली पे आ जाती
है, उसे uncomfortable
मत कर”
“मज़ाक नाम की भी कोई चीज़ होती है भई” जीनी ने चिढ़ते
हुए कहा
“नहीं नहीं मैं ठीक हूँ, इट्स ओके इतना तो चलता ही
है” मैंने कहा
“अरे इसकी आज तक कोई गर्लफ्रेंड नहीं रही ना तो ये
छोटे-छोटे मज़ाक से डर जाता है लेकिन मुझसे पता नहीं खौफ क्यों नहीं है इसे, जब
देखो तब कुछ भी नामों से बुलाता रहता है”
“अरे तू भाई है अपना, और भाई को तो आप कुछ भी बुला
सकते हैं ना...है ना जीनी प्रधान”
ये जान- प्रधान का रिश्ता काफी सुलझा हुआ था लेकिन उन
दोनों को देखकर ऐसा कभी लगा नहीं। हमेशा लड़ते रहते थे दोनों बिल्कुल बेस्ट फ्रेंड
की तरह। उस रात मैं अच्छा महसूस कर रही थी। दिन में पढ़ाई भी अच्छे से हुई, 2 दोस्त
भी बन गए थे, मैं सोने से पहले कुछ लिखना चाहती थी सो डायरी पेन हाथों में ही लिया
ही था कि तभी मेरे फोन की घंटी बजी, अन्नोन नंबर था, मैंने थोड़ा हिचकिचाते हुए फोन
उठाया।
“हैलो”
“हैलो उमा, सॉरी इतनी रात तो डिस्टर्ब करने के लिए, मैं शिवांश बात कर रहा हूँ”
“हाँ शिवांश... क्या हुआ?”
“वो यार मैं अपना चार्जर लाइब्रेरी में भूल आया... फोन 5 पर्सेन्ट चार्ज है,
तुम्हारा चार्जर मिल जाता तो? तुम्हारा नंबर मैंने जीनी से लिया है, मैंने पहले
उसी के पास फोन किया था लेकिन उस जाहिल ने मना कर दिया”
“रीलैक्स रीलैक्स कोई बात नहीं इतना इक्स्प्लैन करने
की जरूरत नहीं”
“थैंक यू, मैं छत पे ही हूँ, यहीं से ले लूँगा”
मैं चार्जर लेकर छत पे चली गई, शिवि के कमरे की छत मेरे कमरे की छत से मिलती थी।
उसकी छत पर एक कुर्सी और स्टूल भी था जिसपे राख पात्र रखा हुआ था। वह कुर्सी पर
बैठा सिगरेट के कश ले रहा था और कुछ बुदबुदा रहा था।
“शिवांश”
मुझे सुनते ही उसने हड़बड़ाहट में आधी पी हुई सिगरेट
राख पात्र में घूसा दी। वह मेरी तरफ तेज़ी से चलता हुआ आया।
“thankyou”
“अरे कोई बात नहीं”
इतना कहकर हम अपनी-अपनी दिशा में मुड़ गए लेकिन फिर
मैंने उत्सुकता वश उससे पूछ ही लिया कि-
“शिवांश, तुम्हें ऐसे ही सिगरेट पीते हुए बुदबुदाने
की आदत है या बस आज ही”
वह मुड़ा और एक क्षण के लिए बस चुप होकर मुझे देखता
रहा फिर धीरे-धीरे मेरी तरफ चलके आया।
“सिगरेट पीने की आदत कॉलेज के दोस्तों ने लगा दी,
बुदबुदाने की साहित्य और फिलासफी ने, तुम्हें अजीब लगा होगा न”
“नहीं, मुझे सुखद लगा”
उसने आश्चर्य से आँखें बड़ी करते हुए कहा- “सुखद?”
“हाँ, तुम इस वक्त ना अतीत में थे, ना भविष्य में,
तुम सिर्फ अपने में खोए थे, अभी में और अपने-आप में”
“लेकिन मैं तो एक उलझन में था और उलझन तनाव पैदा करती
है तो ये अनुभव सुखद नहीं था”
“ओ अच्छा, ये मैंने नहीं सोचा, वैसे किस उलझन में थे
तुम?”
“यही कि कालिदास अगर अभाव से भरा जीवन नहीं जीता तो
क्या वह प्रियंगु से विवाह करता? खैर छोड़ो”
“नहीं, बिल्कुल नहीं करता, लेकिन फिर कालिदास- ‘कवि कालिदास’ नहीं बन पाता, लोग तो
यही कहते हैं कि बिना दर्द के कुछ लिखा ही नहीं जाता ”
“हाँ और वैसे भी दुनिया में रहते हुए किसका जी नहीं
करेगा धन-दौलत के साथ जीने का”
“लेकिन कालिदास को धन सिर्फ समाज को दिखाने के लिए ही
चाहिए था”
“मैं ऐसा नहीं मानता, कोई भी इंसान किसी भी स्थिति
में खुद को बेहतर बनाना ही चाहेगा”
“हाँ लेकिन इसकी शुरुआत समाज को खुश करने से होती है,
अगर कालिदास कवि बनकर 4 पैसे कमाता तो ज्यादा सही रहता”
“लेकिन समाज फिर भी उसे टुच्चा कवि ही मानता, राजकवि
बड़ी चीज़ है भई”
“और उस पद में कालिदास स्वयं कहाँ है?”
“कालिदास बैठा है सिर्फ अपने भीतर”
“लेकिन ये तो गलत बात है ना, हमेशा अपने ही भीतर बने
रहना, कालिदास आज़ाद क्यूँ नहीं हो सकता?”
“कालिदास छोड़ो, न मल्लिका आज़ाद थी, ना अंबिका ना
विलोम”
“ना हम” इतना कहकर मैं चुप हो गई और फिर शिवि ने जो
कहा, मैंने वो कुछ नहीं सुना।
कुछ 2-3 मिनट तक शिवि बोलता रहा और मैं बस अपना सिर
हिलाए जा रही थी। उसने फिर मुझे झटका देकर कहा-
“कहाँ खो गई?”
“नहीं, यहीं हूँ”
“ओके... अच्छा बहस कभी बाद में करेंगे, मैं अपना फोन
चार्ज लगा लूँ, कल मिलते हैं, चार्जर भी कल सुबह ही देता हूँ, काम चल जाएगा ना?”
“हाँ- हाँ, चलो गुड नाइट”
“गुड नाइट”
इस रात के बाद कुछ दिनों तक सब कुछ सामान्य सा ही
रहा, हम तीनों एक साथ लाइब्रेरी जाते, पढ़ाई करते, बातें करते मेरा भी मन अब पहले
से ज्यादा लगने लगा था दिल्ली में। एक दिन हम यूं ही चाय पर बैठे गप्पे लड़ा रहे
थे। जीनी ने अचानक मुझसे पूछा-
“तो आज ट्रुथ एण्ड डेयर खेला जाए?”
“नहीं यार, हर बार वही बोरिंग सवाल, तुम लोग थक नहीं जाते क्या?” शिवि ने इस खेल
की तुच्छता बताते हुए कहा।
“नहीं, भई अच्छा तो है, वो सब बाहर आ जाता है, जो हम
दुनिया से छुपा रहे होते हैं” जीनी ने कहा।
“जानना
ही क्यूँ है अगर कोई अपने निजी क्षण ज़ाहिर ही नहीं करना चाहता”
शिवि ने पता नहीं क्यों ये बात मेरी तरफ
देखते हुए कही। मुझे ये आभास हुआ कि उसने मेरे भीतर झाँककर देख लिया है, वह सब सच
जानता है और मैं नकाब पे नकाब ओढ़े जा रही हूँ।
“नहीं शिवि, खेलते हैं ना, क्या ही हो जाएगा, और वैसे
भी अगर आप अपना निजी कुछ न बताना चाहो तो आप डेयर ले लेना” मुझे ये बिल्कुल नहीं
कहना था।
जीनी ने वहीं रखी हुई एक बोतल उठाई, किसकी थी पता
नहीं।
मेज़ हमने चाय वाले भैया से ले ली थी। जब पहली दफा
बोतल घुमाई गई तो उसका शिकार हुआ- शिवि
जीनी को तो बस जैसे इसी मौके का इंतज़ार था, उसने इस
तरह से सवाल दागने शुरू किए कि आज ही उसे ठूँठ कर देना चाहती है।
“तो पहला सवाल है mr शिवि.... How
were your college days?”
“अरे direct सवाल पुछ लो भई,
मुझे पता है तुम लोग क्या पूछना चाहते हो”
“तो जवाब आ जाने चाहिए सीधे-सीधे”
“अच्छा था कॉलेज भी, उम्मीदें फिल्में देख कर बढ़ गई
थी और जितना सोचा था, उससे कहीं ज़्यादा बुरी तरह
टूटी, न प्लैस्मन्ट थी, प्लैस्मन्ट की तो बात ही दूर है, भाई वहाँ लेक्चर ढंग से
लग जाना ही बड़ी बात थी”
“मुद्दे से न भटका जाए तो ही बेहतर है शिवि मियां”
जीनी ने मुंह बनाते हुए कहा
“सवाल का सीधा-सीधा जवाब ही दिया गया है” शिवि ने
हास्य-व्यंग्य वाले भाव से कहा।
“हिन्दी साहित्य के विद्यार्थी हो, व्यंजना क्या होती
है, मालूम होगा ना” जीनी के शब्द तीखे थे
“हम आजकल अभिधा में बात करना ज्यादा पसंद करते है”
“देखिए मुद्दे से ना ही भटक जाए तो ही बेहतर है” जीनी
फिर चिढ़ते हुए बोली
“ठीक है-ठीक है, लेकिन मैं स्पष्ट करता हूँ कि इस
मुद्दे से जुड़ा हुआ ये पहला और अंतिम सवाल होना चाहिए”
हम सबने सिर हिला कर हामी भरी। अब शिवि की मुद्रा ठीक
वैसी हो गई थी जैसे अपने अतीत के दर्शन वह किसी सिनेमा हाल में बैठकर कर रहा हो,
कुर्सी के पीछे से हाथ घुमाकर वह भाषण देने के मूड में आ चुका था।
“ये कोई मुद्दा नहीं बल्कि एक कहानी है, वो कहानी जो
ना घटी होती तो ही बेहतर था लेकिन अधूरी चीज़ का भी अपना एक अलग मज़ा है, वो सीनियर
थी, हमने कभी कहा नहीं, लेकिन कॉलेज के 3 साल बस देखते हुए ही गुजारा हो जाएगा ये
पता नहीं था। उसकी सारी टाइमिंग नोट कर रखी थी मैंने लेकिन नोट किया हुआ कभी काम
नहीं आया”
शिवि की आँखें ऐसी हो गईं थी जैसे वह फिर से उसे देख
रहा हो। आसमान की ओर आंखे, संस्मरण वाला भाव, एक अबोध मुस्कान और थोड़ा सा पछतावा
पीछे से खट-खट करता हुआ उसे झुँझलाने की कोशिश कर रहा था। वह अचानक से जैसे जागा
और बोला –
“मुझे लगता है कि मुद्दा खत्म!!!!”
“नहीं नहीं भई मुद्दा खत्म तो कतई नहीं हुआ, ऐसा
किसने कहा?” जीनी अब उत्सुकता के साथ उछल रही थी, वह कहानी सुनने के पूरे जोश में
आ चुकी थी, वह कुर्सी पे बैठे हुए ही थोड़ी सी आगे की तरफ झुक गई थी।
“नाम के बिना कोई कहानी पूरी हुई है भला?” उसने पुनः
कहा
“हाँ शिवि, कम से कम सारांश जैसा तो कुछ बताओ, इसमें
तो मध्य तक भी ठीक से नहीं पहुंचे थे” अब उत्सुकता मुझपे भी चढ़ने लगी थी। शिवि ने
कुछ नहीं कहा, शायद वह उन यादों के साथ बह गया था। वह चुप होने के साथ साथ गंभीर
हो गया। हम सबने भी अब उससे पूछना बंद कर दिया। जीनी को भी शायद कुछ ऐसा याद आ गया
जो नहीं आता तो ही ठीक था। लगभग 1 मिनट तक हवा बहुत अजीब सी हो गई थी। 1 मिनट बाद
मैंने कहा कि- “चलो चलते हैं यार, काफी देर हो गई हमें, अब पढ़ लेना चाहिए। शिवि
उठा, फिर हम सब उठे, मैं और जीनी कुछ कदम आगे चल चुके थे, हमने जैसे ही पीछे मुड़कर
देखा- शिवि की पीठ हमारी ओर है और वह अपना मुंह अपनी बाजू से पोंछ रहा है, फिर वह
मुड़ा – एकदम मुस्करते हुए, लेकिन उसके दाहिने बाजू की तरफ से शर्ट गीली हो गई थी।
लड़के ऐसा ही तो करते आए हैं। हम तीनों लाइब्रेरी चले गए। मैंने लाइब्रेरी में बैठे
बैठे ही जीनी को व्हाट्सप्प किया कि –
“अचानक से सब इतना serious क्यों
हो गया?”
उसका जवाब आया –
“सबके पास रोने के लिए एक वजह होती है”
“तो शिवि ने आज कुछ बताया क्यों नहीं”
“हम हमेशा सोचते हैं कि अतीत को दफन कर देंगे और एक दिन उससे निजात पा लेंगे लेकिन
अतीत तुम्हें काटता रहेगा किसी कीड़े की तरह, वो चिपका रहेगा हमेशा तुमसे लेकिन तुम
दर्द से कराह भी नहीं सकते”
जीवन में कभी-कभी अभाव जीवन जीने
का कारण बन जाता है, कभी-कभी यथार्थ कल्पना के
पीछे बैठा वार करता है, ठीक उतनी ही तेज़ी से जितनी तेज़ी से हम उसे छिपाने की कोशिश
करते हैं। उस दिन टपरी पर बैठे जीनी के सवाल उस यथार्थ को सामने लाने कि पूरी
कोशिश कर रहे थे, लेकिन हम अपने आप को पूर्ण सच्चा दिखाने में हमेशा समर्थ नहीं हो
पाते (चाहते हुए भी नहीं)।
अगले 2 महीनों तक सब कुछ सामान्य हुआ लेकिन इस
सामान्य के बीच कुछ न कुछ असामान्य ज़रूर पैदा हो रहा था। ये सिर्फ मैं और शिवि ही
जानते थे। मैं कुछ उदास सी एक रात, हाथ में चाय लेकर छत पर चली गई। शिवि उस रात भी
छत पर ही था। वही एक हाथ में सिगरेट, सामने स्टूल पर राख-पात्र, उसका वही
बुदबुदाना। मैं उसे कई देर तक देखती रही। चाय का घूंट लेटे वक्त मेरी आँखें अपने
आप ही बंद हो गईं। बंद होते ही जैसे कोई दरवाज़ा खुल गया हो, जिसमें से मुझे कोई
झांक रहा है। मैंने गौर से देखा तो वह प्रशांत था। मैंने झटके से आँख खोली। सांसें
तेज़ हो गई। मैंने अपनी पीठ घुमा ली। मैं वहाँ से भाग जाना चाहती थी। कहाँ पता
नहीं। मुझे एक अनजाने से अपराध बोध ने जकड़ लिया था। शिवि ने मुझे आवाज़ दी-
“अरे ! तुम कब आई, आई तो सही लेकिन मुझे आवाज़ भी नहीं
दी, क्या बात है भई”
“अरे कुछ नहीं तुम आज फिर बुदबुदा रहे थे सो मैंने
तुम्हारी ध्यान-मुद्रा को भंग करना ठीक नहीं समझा”
“ध्यान- मुद्रा! वाह ! कहाँ से आते हैं ये शब्द”
“अब हिन्दी-साहित्य सिर्फ तुम ही नहीं पढ़ते भई इस जगत
में”
“हाँ-हाँ सही बात है, लेकिन तुम मुझे आवाज़ तो दे ही
सकती थी, वैसे भी लोग मेरे इस बुदबुदाने को फिजूल ही समझते हैं”
“मुझे ऐसे नहीं लगता”
शिवि ने संशय की दृष्टि से मेरी ओर देखा और कहा-
“क्यूँ भई, तुम कोई अलग हो क्या, ज़्यादा बनो मत” वह
अजीब तरीके से चिढ़ते हुए बोला। मैं उसे इस तरह बोलते हुए देखकर थोड़ा हैरान हुई,
फिर मैंने भी गुस्से में 2-4 फूल झाड़ दिए।
“बनो मत का क्या मतलब है? बनना कैसे होता है समझाओगे
ज़रा” मैंने आँखें बड़ी करते हुए कहा।
“तुम लड़कियों को हर बात में इतनी तकलीफ क्यूँ होती
है, मैंने कहा बनो मत, तो तुम बन ही रही होगी ना”
“तुम भी आ गए ना, लड़के- लड़कियों और एक बार फिर तुमने
साबित कर दिया कि लड़के ऐसे ही होते हैं”
“ऐसे ही होते हैं का क्या मतलब है? कैसे होते हैं
लड़के?”
“देखो शिवि मैं अभी कोई बहस नहीं करना चाहती”
“बहस मुझे भी नहीं करनी, और कोई लड़की मेरे बुदबुदाने
को नहीं समझ सकती और सारे लड़के एक जैसे नहीं होते”
मैंने गुस्से में अपने हाथ में पकड़े हुए कप को ज़ोर से
हमारी छत के बीच की दीवार पर रखा और कहा-
“अगर कोई लड़की समझ भी ले तो तुम लोग विश्वास करना ही
नहीं चाहते कि कोई तुम्हें समझ सकता है” ये बोलते समय मेरी आँखों में आँसू आ गए
थे। शिवि घबरा गया उसने अपनी सिगरेट फेंकी और मेरी बाजुओं को सहलाते हुए बोला-
“सॉरी सॉरी सॉरी, यार I am really sorry…
तुम रो क्यूँ रही हो यार, मैंने पता नहीं ऐसा क्यूँ कहा”
“मैं ठीक हूँ... गुड नाइट” इतना कहकर मैं आँसू पोंछते
हुए, एक तरह से भागते हुए वापिस नीचे आ गई। चाय का कप वहीं रह गया।
इस तरह की लड़ाई हर लड़के-लड़की के बीच होती है जो दोस्त
हों और जहाँ दोस्त से कुछ ज़्यादा होने की संभावना हो। शिवि का ये रवैया मेरी समझ
से बाहर था लेकिन इतना जरूर साफ था कि ये आग किसी असामान्य हवा ने ही लगाई थी।
अगले दिन ना शिवि ने मुझसे कुछ कहा न मैंने ही कुछ कहना सही समझा। शाम को जब हम
लोगों के चाय पीने का समय हुआ जीनी ने भांप लिया कि कुछ तो सहज नहीं है। उसने शिवि
से कहा-
“तुम लोग लड़ कर आए हो क्या”?
“नहीं, ऐसा किसने कहा?”
“किसी ने नहीं, ऐसा लग रहा है”
“कुछ नहीं यार, बस थोड़ी गलतफहमी हो गई थी” शिवि ने थोड़ा उदासीन भाव से कहा।
“अरे नहीं, गलतफहमी भी नहीं हुई, 3 महीनों में हम
इंसान को कितना ही जान सकते हैं” मैंने स्वाभाविक टोन में कहा।
“हाँ-हाँ कुछ नहीं हुआ, तू चाय बोल ना”
“नहीं बताना तो साफ-साफ मना कर सकते थे” जीनी चिढ़ते
हुए उठी और चाय के लिए चायवाले के पास चली गई।
“यार कल रात के लिए सॉरी” शिवि गर्दन झुकाए हुए ही
बोला
“अरे कोई बात नहीं, मैंने भी overreact कर दिया था कल”
“यार! तुम्हारी ऐसी सुलझी हुई बातों पर कई बार
विश्वास नहीं होता”
“क्यूँ ?”
“चाय बोल दी है मैंने, और जो भी बात होमेरा मूड खराब मत करना” जीनी वापिस आ गई थी
हम दोनों एक दूसरे की तरफ देखकर मुस्कुराये और फिर
शिवि ने उठकर जीनी के पीछे जाकर, उसके गले में अपनी बाजुओं को डालकर , बिल्कुल
सच्चे दोस्त की तरह कहा-
“जानेमन जीनी, एक तुम ही तो हो, तुम्हारा मूड खराब
करके हम जाएंगे कहाँ”
मैंने भी जोड़ दिया-
“तुम्हारे बिन हमारी मंजिल है कहाँ?”
हम तीनों हंस पड़े और चाय का स्वाद बेहतर हो गया। सारा दिन लाइब्रेरी में पढ़ने के
बाद हम लोग 9 बजे तक अपने अपने कमरों तक पहुँच जाते। रात को 10 बजे के करीब शिवि
का फोन आया-
“हाँ शिवि”
“एक बार छत पे आओगी ज़रा?”
“क्यों, क्या हुआ”
“अरे आओ तो”
“आती हूँ रुको”
छत पर जाते ही मैंने देखा शिवि ने हमारी छत की बीच की
दीवार पर एक ट्रे में 2 कप रख रखे थे। आज वहाँ स्टूल, सिगरेट और राख-पात्र नहीं
था।
“आज 2 कप चाय?”
“एक तुम्हारे लिए”
“मेरे लिए?”
“तुम कल अपना कप यहीं छोड़ गई थी तो मुझे लगा कि आज की चाय मुझे बनाने का हुक्म है”
“शिवि” मैंने लंबी सांस बाहर छोड़ते हुए कहा।
“वैसे तुम कल अचानक रो पड़ी तो मैं घबरा गया था”
मैंने चाय का कप हाथ में उठाते हुआ कहा-“तुमने बात ही
ऐसी की थी”
“अच्छा सॉरी फिरसे”
“रात गई बात गई, मैं इतना लोड नहीं लेती”
“लोड तो तुम लेती हो, वरना कल अचानक रोई ना होती”
उसने मेरी आँखों में कुछ ढूंढते हुए कहा। मैंने अपनी आँखें चुराते हुए कहा-
“तुम्हें तो कुछ भी लगता है”
“हम्म”
“वैसे एक बात बताओ, तुम ट्रुथ- डेयर वाले दिन अचानक चुप क्यूँ हो गए थे?”
“तुम्हें क्यूँ बताऊँ?”
“मत बताओ”
“यार कैसी हो तुम, थोड़ी तो ज़िद करो कि नहीं यार बताओ
शिवि, हम दोस्त हैं तो बताओ”
“हम दोस्त हैं?” शिवि एक सांस में इतना बोलकर चुप हो गया फिर बहुत धीमे और गंभीर
स्वर में बोला-
“क्या नहीं हैं?”
“हमें साथ उठते बैठते 3 महीने हो गए हैं, तो कम से कम
दोस्त कहने के लिए इतना समय तो काफी है” मैंने उसे चिढ़ाते हुए और हँसते हुए कहा।
“क्या यार” ऐसा लगा कि वह किसी सवाल के नीचे कई देर
से दबा हो और अब मुक्त हो गया हो।
“अच्छा बताओ तो, आज चाय पे चर्चा का विषय है-
तुम्हारी कहानी”
“क्या कहानी यार”
“बताओ भी” मैंने थोड़ा डांटते हुए सा कहा।
“कुछ नहीं बस एक लड़की पसंद आई थी कॉलेज के दिनों में,
उसे भी मैं पसंद था लेकिन बात बन नहीं सकती थी”
“क्यूँ?”
“पढ़ाई में भले ही मैं उससे आगे था लेकिन मैं कोई भी
नौकरी कर लूँ, उनके बिजनस के आगे कभी नहीं टीक सकता था इसलिए कभी बात करने की
कोशिश भी नहीं की”
“तो तुम्हें कैसे पता कि वो भी तुम्हें पसंद करती थी”
“ऐसा मैं खुद को खुश रखने के लिए सोच लेता हूँ”
“मतलब इस बात का कोई प्रूफ नहीं है”
“नहीं यार”
“मतलब तुम्हारा भी one-sided
था”
“तुम्हारा भी मतलब? मतलब तुम्हारा भी था” शिवि ने
बहुत उछलते हुए पूछा।
“हम्म... कह सकते हैं”
“चाय पे चर्चा तो अब घंटों चलेगी, मुझे पूरी कहानी एक साथ सुननी है”
“अरे ऐसा कुछ नहीं है, तुम अवें ही उड़ रहे हो”
“महोतरमा मैं उड़ना चाहता हूँ, जल्दी बताओ जल्दी”
“चाय तो पी लो पहले”
“चाय तो चल ही रही है, तुम शुरू करो”
“मुझे नहीं बताना यार”
“हम्म... देख रहा हूँ लड़की शर्मा रही है हमारी, अबे
बता यार”
पहले प्रेम की बातें करना ऐसा होता है जैसे सारा
प्रेम एक साथ जी लेना। मैंने मना करते हुए भी जान बुझ कर कहा –
“वो classmate था मेरा,
कॉलेज कम आया करता था, 2 साल तक उसके प्रति कोई अलग भाव नहीं फिर आखरी सिमेस्टर
में पता नहीं कैसे सब अच्छा लगने लगा”
“फिर”
“फिर क्या कहानी खत्म”
“ऐसे थोड़ी होता है यार उमा” उसने नाराज़ होते हुए कहा
“ऐसा ही तो होता है”
“तो तुमने उससे कभी नहीं कहा कुछ?”
“किया था मैसेज इंस्टा पे लेकिन उसके रिप्लाइ ने सारी
उम्मीद ही तोड़ दी”
“क्या कहा उसने?”
“यही कि वो किसी और से प्रेम करता है” मेरे ये कहते ही हवा थोड़ी ज़्यादा ठंडी हो
गई, चाँद और अधिक चमकने लगा, अंधेरा और गहरा हो गया और मैं सिहर उठी।
“क्या! कैसा पागल लड़का है वो” उसने गुस्से के भाव से
कहा।
“पागल तो बिल्कुल भी नहीं है” मैंने ऐंठते हुए कहा।
“तूने क्या कहा उससे?”
“मैंने कुछ कविताएँ लिखीं थी उसके लिए तो सारी भेज दी, ये कहते हुए कि कुछ लिखा है
तुम्हें सोचकर, उसने पढ़ी और स्पष्ट कर दिया कि वो मुझसे प्रेम नहीं करता” मैं ये
कहते हुए सहज होने की कोशिश कर रही थी लेकिन भीतर तूफान रह-रह कर उठ रहा था, गला
भरते-भरते रह जाता, आँखों में आँसू आते-आते रह जाते और मैं बाहर से तटस्थ हो जाती।
“are you fine?”
शिवि के ये कहते ही आधी बची चाय के कप में 2 आँसू घुल
गए, मेरे शरीर से गरम हवा निकलने लगी और आसमान में घुलने लगी, आँखें भारी हो रही
थीं और हाथ कंपकंपाने लगे। शिवि ने अपना आधे से कम बची चाय का कप हड़बड़ाहट में ट्रे
में रखा और कहा –
“you are not fine यार, एक काम करो
तुम खुलकर रो लो एक बार, मैं यहीं खड़ा हूँ, whenever you feel fine then
tell me” इतना कहते ही उसने मेरे प्रतिक्रिया का इंतज़ार नहीं किया
और वह मुझसे थोड़ा दूर अपनी छत पर एक किनारे खड़ा होकर फोन चलाने का अभिनय करने लगा।
आजकल के लड़के कम से कम इतने समझदार तो जरूर होते हैं। मैंने कुछ 2 मिनट बाद खुद को
संभालते हुए उसे आवाज़ लगाई-
“शिवि”
“ओह हाँ आया”
वह तेज़ी से मेरे पास चलता हुआ आया। मेरी आँखों में
अभी भी आँसू थे। हवा अब कुछ पहले से हल्की लग रही थी, अंधेरा भी उतना गहरा नहीं
था। उसके आते ही मैंने कहा-
“उसका नाम प्रशांत है और वो पागल तो बिल्कुल नहीं है”
मैंने सिसकियाँ लेते हुए ही कहा। शिवि भी हल्का सा मुस्कुराया। मैंने फिर जैसे एक
सांस में कहा-
“तुम्हें पता है शिवि, वो बिल्कुल वैसा है जैसा हम
हिन्दी साहित्य में धिरोदात्त नायक के बारे में पढ़ते हैं। बहुत ही शांत, कोमल,
कठोर और धैर्यशील। जब भी उसे देखती थी तो लगता था सब कितना सुलझा हुआ है, लेकिन अब
मैं फिरसे बंध गई हूँ शिवि और तो और मैंने झुमके भी...”
“झुमके भी...”
“पहनने छोड़ दीये हैं” मैंने बस इतनी आवाज़ में कहा
जितनी आवाज़ में सिर्फ सन्नाटा होता है।
“पहनने छोड़ दीये हैं? क्यूँ ?”
शिवि का क्यूँ बिल्कुल वैसा था जैसे मुझसे उस अपराध
के लिए सवाल किया गया हो जो मैंने किया ही नहीं। यह ‘क्यूँ’ मुझे धक्क से वापिस
मेरे घर ले गया।
“शिवि... घर ... घर ....” मेरी सिसकियाँ रुकने की
बजाए और बढ़ गई थीं
“ मैं बहुत कुछ करती शिवि... पापा ...समाज...” मैं
निढाल सी होती जा रही थी, मुझे किसी सहारे की जरूरत थी।
“मैं ...प्रशांत” सब कुछ जैसे मेरे दिमाग में तूफान
की तरह घूम रहा था, मैं इस तूफान से कांप रही थी।
मैं सिसकियाँ लिए जा रही थी और हर शब्द एक टूटन लिए
बाहर आ रहा था। शिवि ने मेरे हाथ अपने हाथों में ले लिए।
“मैं सुन रहा हूँ”
“शिवि, पापा के जाने के बाद मैं खुद को आज तक नहीं
संभाल पाई हूँ, मुझे हमेशा से राइटर बनना था लेकिन मैं कुछ नहीं कर पाई... माँ तो
बस 7 साल तक ही मेरे साथ थी”
मैंने एक सांस में ही इतना सब कह दिया। मेरे हाथों ने
शिवि के हाथों को कसकर थाम लिया था। मेरे आँसू उसके हाथों को भिगो चुके थे।
“आराम से- आराम से उमा, लंबी सांस लो” उसकी आवाज़ में
भी पीड़ा आ पहुंची थी।
मैंने कोई सांस ही नहीं ली, मेरी आवाज़ और भी तेज़ हो
गई।
“शिवि, मैं वो हो गई हूँ जो कभी नहीं होना चाहती थी,
मुझे घुटन महसूस होती है शिवि, मैं सांस नहीं ले पाती, और प्रशांत... प्रशांत मेरे
साथ होता तो सब... सब ठीक हो जाता”
मैं अब चिल्लाने की अवस्था में आ चुकी थी, वह दोनों
छतों को अलग करने वाली मुंडेर लांघकर मेरी तरफ आ गया। मैंने कब अपने आप को उसके
वक्ष से सटा लिया, मुझे कुछ पता नहीं। उसके वक्ष की गर्माहट से मेरे भीतर जो भी
कठोर था, सब पिघल गया, उसने मुझे कसकर गले लगा लिया था।
“प्रशांत को देखकर पता नहीं क्यूँ ये एहसास होता कि
उसके साथ खुलकर जी पाऊँगी, मेरे चाचा- चाची बहुत अच्छे हैं शिवि ... बहुत अच्छे
हैं... मेरे पापा शिवि... पापा क्यूँ चले गए शिवि... प्लीज पापा को ढूंढ दो
शिवि... प्लीज”
प्लीज मैंने इतना चिल्ला कर कहा कि मेरी सारी ऊर्जा
खत्म सी होने लगी। मैं शिवि की बाहों में सिकुड़ सी गई थी। मेरी आँख बंद होने से
पहले मुझे शिवि के वक्ष के हिस्से की शर्ट के गीलेपन का एहसास हुआ उसके बाद मेरी
आँखें बंद हो गईं।
जब सुबह मेरी आँख खुली तो मेरा सिर शिवि की गोद में
था। शिवि दीवार से सटकर बैठे बैठे ही सो गया था। मेरी आँख खुलने के बाद मैं थोड़ा
सा हिचकिचाई... मैंने आँख मचलते हुए शिवि की ओर देखा, वह अभी भी सो रहा था। एक बार
के लिए मेरी आँखें उस पे ठहर गईं। हवा पहले से हल्की महसूस हो रही थी। सूरज की धूप
आज पहले से ज़्यादा सुनहरी थी। उसकी शर्ट पर आंसुओं के निशान तितलियों जैसे उड़ रहे
थे। उसके चेहरे पर रात की नमी और सुबह की धूप एक साथ ठहर गई थी। उसका चेहरा सोते
हुए बच्चे जैसा लग रहा था। उसे ना चाहते हुए भी उठाना जरूरी था। मैंने उसे उठाते
हुए उसे आवाज़ दी।
“शिवि... शिवि”
उसने धूप को रोकते हुए आँखें खोलीं। रात की नमी से वह
मुस्कुरा उठा। वह अंगड़ाई लेते हुए बोला-
“are you fine”
मैंने मुसकुराते हुए हाँ में सिर हिलाया और कहा-
“good morning शिवि”
“morning टाइम कितना हुआ है?”
“पोने 8”
उसने आँखें बड़ी करते हुए कहा-
“पोने 8?”
वह अपने कपड़े झाड़ते हुए उठा और अपनी छत की तरफ कूदते हुए बोला-
“लाइब्रेरी में मिलते हैं”
अपनी छत पर छलांग लगाने के बाद वह चाय के दोनों कप
अपने हाथ में उठाए हुए नीचे चिल्लाते हुए चला गया-
“कल रात की चाय बहुत अपनी थी”
मैं कुछ देर तक उसका जाना अनजानी मुस्कान के साथ
देखती रही। लाइब्रेरी में ऐसा कुछ नहीं हुआ जिससे कुछ भी अलग लगे ना ही चाय की
टपरी पर, लेकिन हमारे अनकहे में ये नियम बन गया था कि रात की चाय बिना सवाल के एक
साथ पी जाएगी। सब स्वाभाविक पेश करने की ज़रूरत में ज़रूर कुछ अस्वाभाविक घट रहा
होता है जिसे जीने वाले हमेशा नकारने की नकल कर रहे होते हैं। हमारे दिन बहुत
सामान्य गुज़रते लेकिन रात को चाय की गर्माहट के बहाने एक दूसरे के अतीत को उधेड़ा
जाता फिर उसे इस तरह से सिया जाता कि हम कम से कम उसे अपने नज़रिये से देख पाते। तमाम
काश, मैं चाहती-चाहता था, एक दिन, कभी तो, के अथाह समंदर के बीच संभावनाओं के धागे
पिरोये जाते और अतीत उतना दुखद नहीं लगता। अतीत जब भी कम पीड़ा देने लगे तो ज़रूर
भविष्य तुम्हें अपनी ओर खींच रहा होगा और तुम खुद पर जमी धूल को झाड़ चुके होगे।
मुझे दिल्ली रहते हुए 8 महीने हो चुके थे। यूपीएससी
की तैयारी भी ठीक ठाक चल रही थी, जीनी के घरवालों की चूंकि ये ज़िद थी कि जीनी को
अब घर रहकर ही तैयारी करनी चाहिए तो जीनी पिछले हफ्ते ही घर चली गई थी। मैं और
शिवि अब तक भी रात को चाय पीना नहीं भूलते थे। एक हफ्ते तक जब जीनी के जाने की कोई
बात नहीं की तो बोझ हद से ज़्यादा बढ़ने लगा। उस रात मैं 9:38 तक छत पर पहुँच गई थी।
शिवि पहले से आ चुका था। उसने मुझे चाय दी और बिना कोई भी हरकत किये, सपाट चेहरे
के साथ अचानक बोला-
“तुम भी चली गई तो?”
“मतलब”
“जीनी के साथ रहने की आदत हो जाएगी पता नहीं था”
“मैं भी जीनी को miss करती हूँ”
“अगर कल मैं चला जाता हूँ तो what will
you do?”
“ये कैसे सवाल है?”
“मैं सच में जानना चाहता हूँ”
“क्या?”
“मेरा ना होना तुम्हें कितना नुकसान लगेगा?”
“ऐसा क्यों हो कि तुम्हारा जाना मुझे नुकसान लगे?”
“क्या मेरा जाना फायदेमंद होगा?”
“ये कैसी बकवास है?”
“तो तुम सब स्पष्ट कर क्यूँ नहीं देती?”
“सब कुछ साफ ही तो है शिवि, तुम किस उलझन में हो?”
“मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा... मैं जीनी को बहुत miss कर रहा हूँ”
मैं और शिवि दोनों चुप हो गए, सर्द हवाएँ गरम महसूस हो रही थीं... हम दोनों
अपनी-अपनी चाय जल्दी पीने लगे थे। चाय में अब बहुत सारी दुविधाएँ, सवाल, अजीब सी
हवा और हल्की सी कड़वाहट भी घुल गई थी। मैंने एकदम से लंबी सांस लेकर शिवि से अपनी
नाराजगी रोकते हुए हल्के से तीखेपन के साथ कहा-
“शिवि, जब सब कुछ अंदर धंसा होता है तो कुछ समझ नहीं
आता, जब हमारा घर-घर जैसा नहीं रहता तो हम हर दूसरे इंसान में अपना घर ढूँढने लगते
हैं, तुम मेरा घर हो शिवि जहाँ से मैं कभी नहीं जाना चाहती”
शिवि की आँखें नम हो चुकी थी, वह मेरी ओर देख तक नहीं
पाया।
चाय का कप खाली हो चुका था और उसने अपने दोनों हाथ
अपनी pent
की जेब में घुसा लिए थे। मैंने भी अब नजरें नीचे झुका लीं थी, चाय
का कप मैंने ज़रूरत से ज़्यादा कस कर पकड़ लिया था। शिवि शायद वो कहने में कतरा रहा
था जिसे मैं सुनने से कतराती थी। कुछ देर तक किसी ने कुछ नहीं बोला। शिवि थोड़ी देर
तक दाई ओर के आसमान को ताकत रहा और मैं छत को। फिर एक टूटते हुए तारे को दिखाने के
लिए उसने अपनी कुहनी से मुझे इशारा किया। मैंने जैसे हड़बड़ाहट में अपनी नजरें ऊपर
उठाईं, जब तक मैं उसे देख पाती, तारा आसमान में कहीं खो हो चुका था। मैंने कहा-
“मैं देख नहीं पाई”
“शायद तुम्हें जिसे देखना चाहिए, तुम देख नहीं पाती
हो”
“मतलब”
अब हम आमने-सामने थे। शिवि की आँखें चमक रही थीं।
चाँदनी उसके पूरे चेहरे को ढकी हुई थी। इस नाराजगी में वह ज़रूरत से ज़्यादा खूबसूरत
लग रहा था।
“हमारे बीच जो भी है उमा वह प्रेम से अधिक एक ऐसी जगह लगती है जहाँ तुम अपने से
मिलने की कोशिश करती हो”
“मतलब”
“तुम प्रशांत में भी वह सब ढूंढती रही जो तुम्हें घर
से चाहिए था लेकिन कभी मिल नहीं पाया, अब शायद तुम मुझमें भी वही ढूंढती हो”
“मैं क्या ढूंढती हूँ शिवि?” मेरा दिल बैठने लगा था
“पता नहीं”
भरी सांस के साथ वह वह फिर बोल उठा-
“शायद तुमने खुद को उस दुख से बांध रखा है जो तुम्हें
स्वयं आज़ाद करना चाहता है”
इतना कह देने के बीच वह सब ढह गया जो मैंने आज तक
संभाल कर रखा था। शायद वह सही था, मैं जिसे आज तक नकारती आई थी, उसने वह कह दिया,
कितनी आसानी से।
मैं उसकी तरफ सिकुड़ रही थी, हम दोनों पहले से ज़्यादा
करीब थे। उसकी पकड़ में गर्माहट थी।
“नहीं... नहीं” मैंने रोते हुए दबी सी आवाज में कहा।
“उमा जब तुमने अपने पापा की मौत को झेला है, अपनी माँ
की लाश को देखा है, गाँव में अब वो बात नहीं है जो उनके ज़िंदा होने पर थी” उसने
प्यार से सहलाते हुए कहा, “मैं कभी वह प्रेम नहीं दे पाऊँगा जो तुम्हें तुम्हारे
पिता दे सकते थे, मैं कभी उनकी जगह नहीं ले पाऊँगा उमा लेकिन बस इतना कहना चाहता
हूँ कि तुम खुलकर जियो, वह मत ढूंढो जो कभी नहीं मिलेगा”
उसके हाथ मेरे गालों को सहला रहे थे।
मैंने उसे सिसकते हुए देखा, वह सच सा मुझे खींचे जा रहा था, मैं दुनिया सी पीछे की
ओर दौड़ना चाहती थी। मेरी आँखों को देखते ही उसके हाथों की पकड़ ढीली हो गई, मैं
कांच सी वहीं बिखर गई। मुझसे खड़ा नहीं हुआ जा रहा था, मैं शिवि के पैरों के पास
जैसे गिर पड़ी। शिवि भी मेरे पास बैठ गया, शायद वह रो रहा था। हवा के भारीपन से
मेरा सिर चकरा रहा था, मैंने अपने घुटने मोड़े और आँखें बंद करके सिसकते हुए अपना
सिर उनमें छुपा लिया। इस अंधेरे में मेरे पिता अर्थी पर थे लेकिन उनके ऊपर से उड़कर
उस सफेद चादर ने मुझे लपेट लिया था। ये चादर किसी पत्थर सी थी। शिवि इस चादर को
खींच रहा था, मैं चादर को अपने से अलग नहीं कर पा रही थी, मैं माँ को पुकार रही थी
लेकिन वो सुन नहीं रही थीं, मैं जितना तेज़ चिल्लाती शिवि बिना कहे उतनी ही तेज़
चादर खींचने लगता। अंधेरा मुझसे और सहन नहीं हो रहा था। मैंने तेज़ साँसों के साथ
शिवि को देखना चाहा। वह एक कोने में जाकर
आसमान को ताकता रहा। मैं उसे घुटनों पर सिर रखे गीली आँखों से देख रही थी। पता नहीं
किसने मुझे संभाला और अपना कप उठाकर बिना उसकी तरफ देखे मैं अपने कमरे में नीचे आ
गई। शायद उसे पता न चला हो। मैं जाते ही अपने बेड पर धम्म से जा गिरी। वह रात उतनी
ही भारी थी जितनी वो सफेद चादर। मैं इस भारीपन में धँसती जा रही थी। मेरे कमरे की
दीवारों की बीच की दूरी धीरे-धीरे कम हो रही थी। सब कुछ जैसे मुझे जकड़ रहा था। बदन
में ज़रा भी होश नहीं था, मेरी नसों में जैसे कुछ जल रहा था, मेरे आँसू उन्हें ठंडा
कर रहे थे। भीतर से सब कुछ बाहर आ जाने के बीच इंसान इस कद्र झेलता है कि जागा हुआ
रहना नामुमकिन हो जाता है।
सुबह के 11 बज चुके थे और मैं ठंड से ठिठुर रही थी।
बदन में बुखार जैसा कुछ लग रहा था, आँखें भारी हो गईं थीं, मैंने अपने कमरे में उस
दिन लाश का उठना देखा। मैंने ठंडे पानी से मुंह धोया, कुछ कपड़े पैक किये, कुछ
किताबें भी और अपने घर के लिए निकल गई। जब बस में थी उस वक्त शिवि ने कई calls और messages किये। मैंने उससे बात करना कतई ज़रूरी
नहीं समझा। बहुत थकने के बाद दिमाग अक्सर खाली सा हो जाता है। मैं बिल्कुल सामान्य
सी उर्मि दी के पास पहुँच गई, मुझे अकेले रहने की ज़िद थी तो उन्होंने पास के एक
होटल में मेरे लिए एक कमरा बुक कर दिया। एक हफ्ते तक मैंने किसी को नहीं बताया कि
मैं कहाँ हूँ, ना कोई calls किये ना ही messages। सवाल उठाया जाना मुझे हमेशा से बहुत ही दर्दनाक लगा है। मैं सारा दिन
कुछ नहीं करती और शाम होने से पहले सारी lights बंद कर दी
जातीं। मैं जैसे किसी कुएं में धँसती जा रही थी। 1 हफ्ता हो चुका था और यही
सिलसिला जारी था। खाने का कुछ आता पता नहीं, आते समय कुछ
ब्रेड ले लिए थे, एक हफ्ते से ब्रेड और चाय चल रही थी,
भूखे पेट सोना तो जैसे कोई बड़ी बात नहीं रही थी। आठवें दिन इसका
भरपूर असर दिखा, मैं सुबह से उल्टियां किए जा रही थी,
शरीर में जैसे जान ही ना बची हो, बुखार से
मुझे मेरा शरीर चलती सांस लेती आग जैसा लग रहा था, चलते वक्त
धुंधलापन आंखों के सामने आ रहा था। मैं दोपहर तक यूंही पड़ी रही, आँखें जल रही थीं। मैने उर्मी दी को फोन लगाया, वे
मुझे लेने आईं और मेरी हालत देखकर थोड़ा घबरा गईं
"ये क्या हाल बना लिया तूने, बैठ जल्दी"
मैं स्कूटी पर बैठी तो लग रहा था अभी गिर जाऊंगी।
हॉस्पिटल आने तक उर्मी दी पूरे रास्ते तक बड़बड़ाती रहीं। मैने हां-ना तक नहीं
कहा। मुझे हॉस्पिटल में भर्ती कर लिया गया। बुरे वक्त में दोस्त अगर बिना पूछे
अपने पैसे आप पर लगा दे तो इसे सौभाग्य से कम नहीं समझना। मुझे पहले drip लगाई गई,जब तक वह खत्म हुई मैं अपनी आँखें नहीं खोल
पा रही थी और नींद जैसी कुछ अवस्था में चली गई थी। उर्मी दी बिल वगैरह की
औपचारिकता पूरी कर मेरे पास आ गई थीं। मेरा बल्ड–टेस्ट किया गया और कुछ 2 घंटे बाद
रिपोर्ट आई। रिपोर्ट आने पर पता चला कि शरीर में पानी की मात्र कम होने की वजह से
लिवर बुरी तरह खराब हो गया है। अपनी बीमारी को अविश्वास की तरह देखना मेरी एक अजीब
आदत रही है। उर्मि दी तमाम दवाइयाँ और नारियल पानी लेकर आए तो उन्होंने कहा –
“3 दिन admit रहना पड़ेगा”
“3 दिन?”
“तेरी हालत देखकर तो मुझे ये कम लग रहा है”
“अरे नहीं यार, हो जाऊँगी जल्दी ठीक”
उर्मि दी ने मुंह बनाते हुए मुझे नारियल पानी दिया।
मुझसे जितना पिया गया मैंने पिया, बच हुआ उर्मि दी ने ले लिया। इन तीन दिनों में
उर्मि दी मेरे साथ ही रहीं।
कभी-कभी अकेले रहना ज़रूरी होता है, अकेले का मतलब है सिर्फ अकेले रहना जिसमें कम
से कम अतीत आपका पीछा करना छोड़ दे, ये 3 दिन ठीक वैसे थे, ये एहसास होना कि जिसे
आप साथ लिए घूमते हैं वह छोड़ देने के लिए ही बना है तो बहुत दर्द होता है लेकिन
छोड़ दिए जाने पर उससे कहीं अधिक हल्का। मैंने अतीत, भविष्य दोनों को छोड़ दिया,
अपने लिए और शायद शिवि के लिए भी।
3 दिन के बाद भी रिपोर्ट नॉर्मल नहीं थी लेकिन अब
मुझे चलने-फिरने में दिक्कत नहीं होती थी। अस्पताल की अब उतनी ज़रूरत नहीं थी सो
हमने छुट्टी ले ली। मैं उर्मि दी के साथ pg में कुछ दिन और रही
मैं ठीक होकर सीधा दिल्ली चली गई। अगले
दिन जब लाइब्रेरी पहुंची तो
शिवि अपनी सीट पर नहीं था। मन में तमाम तरह की भावनाएँ आती-जाती रही, हम
कैसे किसी की अनुपस्थिति को उसकी उपस्थिति में बदल देना चाहते हैं लेकिन अक्सर ऐसा
करने में हमसे देरी हो जाती है। मैं सारा दिन बस किताबें ताकती रही। दिल की गलियों
को ढूँढना जितना आसान है, दिल के घर को ढूँढना उतना ही मुश्किल। मैंने करीब पोने
चार बजे उसे फोन किया। फोन नहीं उठाया गया। मुझमें ठीक पछतावा नहीं था लेकिन मन को
बुरा महसूस हो रहा था। शिवि पर दया का भाव आ रहा था और फिक्र जितनी होनी चाहिए थी,
उससे ज्यादा थी। अगले दिन शिवि लाइब्रेरी में मुझसे पहले बैठ हुआ था। मैंने उसे
दूर से देखा और थोड़ी राहत की सांस पाई मैं बिना उससे नजरें मिलाए अपनी सीट पर बैठ
गई। मेरे बैठते ही उसका व्हाट्सप्प पर मैसेज आया- चाय? मैंने सिर्फ- हम्म भेजा। हम
बिना बात किये चाय की टपरी पे पहुंचे तो बैठते ही उसने तपाक से कहा- सॉरी और उसने
नजरें नीचे झुका ली। मैंने उसे तल्लीन आँखों से पल भर के लिए देखा और उसके हाथ पर
अपना हाथ रख दिया। वो अचानक जैसे कुर्सी से उछल पड़ा और नम आँखें लिए चौंक सा पड़ा।
मेरी भी आँखें आँसू से तर-बतर हो गई और हमने बिना कुछ कहे एक दूसरे को माफ कर
दिया। जितनी चोट उसने मुझे दी थी, मैंने उससे अधिक उसे तकलीफ में रखा।जो दोस्त
आपके किये अपराध को बिना कहे क्षमा कर दे उनसे मुंह मरोड़कर रखना अपने किस्म की ही
एक खतरनाक बेवकूफी है। मैं इस बेवकूफी से दूरी बनाए रखना चाहती थी। उस रात फिर
हमने साथ चाय पी लेकिन इस बार ना किसी का अतीत हमारे साथ था, ना भविष्य की
संभावनाएँ, साथ थीं तो सरल-स्पष्ट भावनाएँ।
बहुत कुछ बुरा होने के बाद जब सब सामान्य सा होने
लगता है तो बुरी चीजें तुच्छ सी दिखाई देने लगती हैं। धीरे-धीरे सब ठीक हो रहा था।
समय की अपनी गति है। पढ़ाई भी वापिस अपने रास्ते पे थी, घरवालों से भी लगभग रोज
सामान्य बात हो जाया करती थी, शिवि का साथ भी सुखद था। ये सामान्य उतना ही सामान्य
था कि जो जगह खाली थी वो खाली थी, जो जगह भर चुकी थी, उसमें अब और जगह बाकी नहीं
थी। दिल्ली में पढ़ाई करते हुए कल मुझे एक साल हो जाएगा, पढ़ाई खूब होती है और
महीने-दो महीने में चाचा के घर भी जाना हो जाता है। मैं अपने घर वापिस नहीं गई।
कैरियर को लेकर मैं और शिवि अब पहले से अधिक गंभीर हो गए हैं, घरवालों से दोनों के
संबंध सामान्य हैं और दोनों जीवन में अपने-अपने प्रेम को प्रेरणा बनाए जी रहे हैं।
रात को जब चाय का समय हुआ और मैं छत पर पहुंची तो शिवि के हाथ में एक ट्रे थी जिसे
आज फूलों से सजाय गया था, उसमें 2 कप थे और एक छोटी सी brownie। उसने मुझे देखकर उत्साह से कहा-
“hey welcome!”
“आज कुछ अलग है?” मैंने अचंभित होकर कहा।
“कल आपको दिल्ली में रहते हुए सम्पूर्ण एक साल हो
जाएगा। दिल्ली आपसे खुश है, आपने दिल्ली के दिल को जीत लिया”
“बस करो dramebaaz”
“दिल्ली ने आपके लिए brownie भेजी
है”
“बहुत लोग दिल्ली में आए गए, दिल्ली हमसे इतनी खुश
क्यूँ है?”
“क्यूंकी दिल्ली को ये एहसास है कि कल हमारी दोस्ती
को एक साल पूरा हो जाएगा”
मैं अचानक ही थोड़ी भावुक हो गई
“ओह्ह, मुझे बिल्कुल ध्यान नहीं था यार”
“हमें तो था”
आज कप में चाय नहीं थी।
“कॉफी?”
“जी हाँ, सोचा आज कुछ अलग किया जाए”
“कॉफी बड़े लोग पीते हैं”
“तुम कॉफी बिल्कुल नहीं पीती?”
“कहा ना कॉफी बड़े लोग पीते हैं”
“तो हम क्या छोटे लोग हैं?”
“नहीं, हम क्यूँ छोटे हुए?”
“तो फिर बड़े लोग कौन?”
“जिनके पास सब होता है”
“हमारे पास क्या नहीं है”
“मेरे पास माँ-बाप, एक सरकारी नौकरी, खूब सारा पैसा
और.....” मैंने जैसे खुद का मज़ाक बनाते हुए कहा
“और मेरे पास?”
“जो तुम चाहते हो तुम्हारे पास हो और तुम्हारे पास
नहीं है”
“हम्म मेरे पास भी सरकारी नौकरी नहीं है और एक
गर्लफ्रेंड की भी कमी है, बाकी तो सेट है” वह ये बात कहके थोड़ा हँसा फिर बोला-
“वैसे कुछ चीजें वक्त के साथ आती हैं”
“तो तब तक चाय पी लेते हैं”
“मतलब कॉफी बड़े लोग बनने के बाद ही पी जाएगी”
“बिल्कुल”
“वैसे बड़े लोग होते भी हैं क्या?”
“हाँ, जो लोग कॉफी पीते हैं”
“अरे यार कोई example देके समझाओ”
“है ना, अपने चाय वाले दादा”
“पर वो तो चाय पीते हैं” वह अब जैसे थोड़ा चिढ़ रहा था।
“नहीं रे, देखो वो अपनी चाय की दुकान से खुश हैं,
उनकी बीवी से वो खुश हैं, बच्चे मेहनती हैं, उनके कहे में है, उनकी इज्जत करते
हैं, सारे स्टूडेंट्स उनकी इज्जत करते हैं और ज्यादा बड़े ख्वाब वे रखते नहीं, सबको
चाय पिलाने के बाद कॉफी पीते हैं आराम से बैठकर”
“interesting”
“अब चाय बनाकर लाओ”
“मैं नहीं जा रहा, आज brownie से
काम चला लेते हैं”
लेकिन अकेले brownie से बात बनी
नहीं और थोड़ी देर में उसे चाय बनानी ही पड़ी।
कभी-कभी वक्त की दौड़ इतनी तेज़ हो जाती है कि हम क्या
महसूस कर रहे होते हैं ये समझ ही नहीं पाते, ऐसे ही एक दिन मैं भी लाइब्रेरी में
बैठे-बैठे रो पड़ी। लाइब्रेरी खाली थी। रात के 2 बज रहे थे। मैंने बिना ये सोचे कि
शिवि क्या सोचेगा, अपनी कुर्सी से उठी और शिवि
को छत पर पहुँच कर फोन कर दिया, यूँ ही बेवजह। शिवि ने फोन नहीं उठाया। मैं
4 फोन कर चुकी थी लेकिन कोई जवाब नहीं आया। फिर सोचा कि रात के 2:15 बजे हैं, वह
भी सो रहा होगा। मैं चुपचाप दीवार से सटकर छत पर ही बैठ गई। बहुत घुल-मिल जाने के
बाद थोड़ी देर का अकेलापन जीवन को समझने के लिए ज़रूरी होता है। ठंडी हवा से जैसे
शरीर में कुछ कौंध रहा था। दिमाग में जैसे अतीत-वर्तमान-भविष्य एक साथ फूट रहे थे।
विचार पहले से अधिक स्पष्ट हो रहे थे। घर-पिता-प्रशांत सब कुछ पहले जैसा सा था
लेकिन अब साथ में शिवि पलट-पलट कर मुझे आवाज़ें दे रहा था। शिवि मेरी वो ज़मीन बन
गया था जहाँ मैंने अपनी कब्र सजाई और मैंने वहीं से फिर जन्म लिया। मैं अस्थिरता
से स्थिरता तक बहुत सरलता से पहुँच गई। मैंने घर फोन किया। चाचा जी बेवक्त किये
फोन से घबरा उठे और एक ही सांस में बोल गए-
“बेटा सब ठीक तो है, इतनी रात को फोन, तुम ठीक तो
ना?”
“अरे-अरे ऐसा कुछ नहीं हुआ है, सब ठीक है”
“तुम सोई नहीं अब तक?”
“थोड़ा पढ़ाई का pressure महसूस हो
रहा है, prelims आने में बस 1 महीना है और पता नहीं तैयारी
कैसी है?”
“हम किसी भी चीज़ के लिए कभी भी तैयार नहीं होते, वक्त आता है और चीजें हो जाती
हैं”
“हम्म”
“ज्यादा मत सोचो, ज़्यादा सोचने से चीजें बिगड़ जाती हैं”
अचानक जैसे भीतर से कुछ फूटा।
“अब नहीं सोचूँगी”
“अच्छा चलो रखता हूँ, यहाँ सब सो रहे हैं, तुम भी सो
जाओ”
“Good
night चाचा जी”
“गुड नाइट बेटा”
मेरे भीतर से जो फूट रहा था, वह बहुत तेज़ी से फूटने के इंतज़ार में था। जो आ रहा था
वह मुझे तेज़ी से कहीं तो ले जाना चाहता था। मैं उठी, कमरे में गई, और अनायास ही
मैंने लिखा:
भीतर का बहुत कुछ निगलने के बाद
सही लगने लगता है थोड़ा बहुत
थोड़ा बहुत सही होने के लिए
लंबे समय के लिए गलत होना होगा
होना होगा विनम्र कि अपनी गलती समझ सको
समझ सको दूसरे को, उसके लिए विस्तार चाहिए
विस्तार चाहिए अपने आप से बेहतर होने को
तब अचानक मेरा फोन बजा। देखा तो शिवि का फोन था,
मैंने उठाया-
“हैलो”
“2:15 बजे 4 फोन?”
“हाँ वो थोड़े ईमोशनल ज़ोन में थी तो फोन घूमा दिया”
“और अब?”
“अब ठीक हूँ”
“मैं सुन सकता हूँ”
“तुम जाग कैसे गए, अभी तो 3 ही बजे हैं”
“अचानक नींद टूट गई, फिर फोन देखा तो तुम्हारी कॉल
थी”
“ओके”
“उस वक्त फोन ना उठाने का मलाल है, सॉरी”
“जो होता है अच्छे के लिए होता है, ज़्यादा मत सोचो”
“अच्छा जी, आजकल बड़े philosophical टाइप के जवाब आ रहे हैं”
“अरे कैसा कुछ नहीं”
“ऐसा है, वरना इतनी emotional लड़की नॉर्मल लाइफ जी ले,
थोड़ा मुश्किल है”
“सो तो है लेकिन संगत का कुछ तो असर होना चाहिए ना”
“कुछ तो बदल रहा है, क्या बात है”
“बात-वात कुछ नहीं, वक्त अपने आप घाव भर देता है”
“पर तुम तो घाव को पकड़े रहने वालों में से हो”
“शायद अब नहीं”
“ओर ये हुआ कैसे”
“पता नहीं”
“interesting”
“क्या interesting”
“मैं सुन रहा हूँ, तुम कहती जाओ”
“तुम भी आजकल मुझे जीनी कि तरह नहीं ट्रीट कर रहे”
“बहारों में खुशबू है जान-ए-मन”
खुशबू-वउशबू कुछ नहीं, अब हम comfortable
हो गए हैं”
“अरे! तभी तो बहारों में खुशबू है”
“अच्छा चलो, कल बताती हूँ, सोना है मुझे भी”
“गुड नाइट”
“गुड नाइट शिवि”
शिवि मैंने इतने प्यार से कभी नहीं कहा था।
Prelims आने तक हमने खूब पढ़ाई की। जो बात अगले दिन
होने वाली थी वो कभी आगे के लिए स्थगित कर दी गई मेरे ही द्वारा। कई बारे चीज़ें
आने वाले वक्त के लिए छोड़ देनी चाहिए....बस बेवजह ही। जैसे जैसे prelims पास आ रहा था, वैसे-वैसे हम बोलते कम सोचते ज़्यादा। चाय भी चुप-चाप पी ली
जाती। 2 दिन बाद prelims था और रात के 11 बजे हम हमेशा की
तरह चाय पी रहे थे। चुप्पी को तोड़कर शिवि बोला-
“क्या लगता है, हो जाएगा?”
“बिल्कुल”
“दोनों का?”
“पक्का होजाएगा”
“नहीं हुआ तो”
“सिर्फ prelims
ही नहीं, यूपीएससी ही हो जाएगा”
“तैयारी नहीं लग रही”
“हम किसी भी चीज़ के लिए कभी तैयार नहीं होते हैं, चीजें बस हो जाती हैं”
उसकी आँखों में चमक सी आ गई।
“हम दोनों का सेंटर सेम है, साथ चलते हैं”
“हाँ, cab बूक करा लेते
हैं”
“हाँ सही रहेगा....२ चलो मिलते हैं परसों ही, कल मैं लाइब्रेरी नहीं आ रहा”
“ओके”
और prelims का दिन भी आ गया। हम
दोनों साथ सेंटर गए, खूब डरे हुए, परीक्षा में बैठे। वे चंद घंटे अपने भीतर बहुत
कुछ समेटे हुए आते हैं, घर, चिंता, डर, अतीत, भविष्य, प्रेम, घृणा, और कुछ बदल
देने का एहसास। उन चंद घंटों में लगता है कि अब तो जो कुछ हुआ, उसे भुलाया जा सकता
ही और एक नई शुरुआत की जा सकती है। कांपते दिल और साहस से डटे मस्तिष्क में से उस
वक्त कोई भी बाजी मार सकता है और दांव पे लगा होता है अगले कुछ सालों का उजाला जो
हमें ज़िंदगी में भरपूर चाहिए। हम परीक्षा देकर
निकले तो जैसे कोई बोझ सा उतर गया।
“कैसा हुआ पेपर?”
“पता नहीं, मतलब ठीक-ठीक, तुम्हारा?”
“सेम”
“discuss
करना है पेपर”
“जो बीत गया सो बीत गया, अब प्रेशर नहीं ले सकती”
“ये भी ठीक है”
“अब बिना सोचे समझे mains की तैयारी कर लेते हैं”
“हाँ, जो होगा देखा जाएगा”
“तो आज का क्या प्लान है”
“घूम लेते हैं यूं ही कहीं”
हम सेंटर से यूं ही किसी अनजानी सड़क पर निकल गए। आपके
साथ अनजानी राह पे जो चलने को राज़ी हो जाए वह कोई तो जादू लिए होता है जिसे आप
टटोलने की हमेशा कोशिश करते हैं।
हम इर्द-गिर्द लोगों से घिरे हुए थे सब कुछ बिल्कुल
आम लग रहा था लेकिन इस आम के बीच यदि कोई आपको न जानता हो तो तकलीफ बहुत गहरी हो
सकती है।
“तुम पहले से काफी बदल गई हो” एकाएक शिवि ने कहा
“अब शायद पहले जितना नहीं सोचती”
“लिखती भी कम हो”
“जब कल्पना में ज़्यादा होती हूँ तो ज़्यादा लिखती हूँ”
“और अब”
“अब कोशिश करती हूँ कि यथार्थ के ज़्यादा करीब रहूँ”
“क्यूँ”
“कल्पना दुख देती है”
“लिखने की प्रेरणा?”
“बिल्कुल देती है लेकिन पीड़ा से उपजे हुए लेखन से अब मैं खीजने लगी हूँ”
“मेरी छोड़ो तुम अपनी बताओ, घर कैसा है अब?”
“सब बढ़िया, mom-dad chandigarh शिफ्ट हो गए हैं, पापा ने नई नौकरी ली है, तनख्वाह पहले से 10000 ज़्यादा
है”
“nice”
“तुम्हारे घर?”
“सब नॉर्मल बस अब चाचा जी से उलट नहीं उनके साथ चलने की कोशिश करती हूँ”
“क्यों भला?” उसने सम्पूर्ण विस्मय से कहा।
“जो भी हो शिवि, पापा के जाने के बाद उन्होंने ही तो
सब संभाला है, मैं आज दिल्ली हूँ, इस बात की कतई चिंता नहीं कि पैसे कहाँ से
आएंगे।“
“लेकिन वह अपना फ़र्ज निभा रहे हैं, इसका मतलब यह तो नहीं कि तुम अपने interest भूल जाओ”
“भूली नहीं हूँ बस थोड़े समय के लिए postpond कर दिए हैं”
“ऐसा तुम्हें लगता है”
“नहीं यार”
“कितनी कविताएँ फ़ोल्डर में सालों से पड़ी हैं”
“पड़ी रहने दो, इंसान कृतज्ञ हो जाता है तो उस कृतज्ञता का भार हमेशा ढोना चाहता
है”
“तुम्हारी मर्जी”
“स्टॉल देखने चलें?” मैंने एक कैफे के बैस्मन्ट की ओर इशारा करते हुए कहा।
वह बिना कुछ कहे उस ओर चल दिया और हम basement में चले गए।
नीचे बहुत सारी स्टालस थीं, बुक्स, candles, paintings, हाथों से बने मिट्टी की प्यारी-प्यारी चीजें, झुमके और भी बहुत कुछ।
“ये मेला सा नहीं लग रहा”
“हाँ वही फ़ील है”
हम शुरू से हर एक स्टॉल का ज़ायका लेते गए और खूब तस्वीरें खींचते गए। लिया दोनों
में से किसी ने कुछ भी नहीं। हम झुमके की स्टॉल पर पहुंचे तो शिवि ने कहा-
“मैंने तुम्हारी पुरानी तस्वीरें देखी हैं इंस्टा पे,
you
always loved jhumkas”
“हम्म”
“तो ले लो जो पसंद है, मेरी ओर से तोहफा”
“नहीं यार, चलो आगे चलो” मैंने उसे बाजू से आगे की ओर खींचना चाहा।
“अरे रुको, मैं पसंद करता हूँ”
शिवि ने कई झुमकों को बार-बार टटोला और फिर एक छोटी
सी झुमके की जोड़ी दिखाकर कहा-
“ये ले लो, ये हर ड्रेस पर चले जाएंगे”
झुमके सच में बहुत प्यारे थे, oxidized silver earrings, ऊपर के
हिस्से में छोटा सा नाचता हुआ मोर था और नीचे गुंबद के आकार की लटकन और उसके नीचे
सफेद मोती।
“मैं अब कहाँ पहनती हूँ?”
“देखो मैंने बहुत सोच-समझकर लिए हैं”
“क्या”
“मोर वक्त आने पर ही अपने पंख खोलता है, तुमने भी अपनी इच्छाएँ वक्त आने के लिए
रोक रखी हैं, जब वक्त आए पहन लेना इन्हें”
उसने झुमके मेरे बैग में रख दिए और मैं निःशब्द सी बस
देखती रही। हमने मेले में खुद को डुबो दिया। ज़िंदगी में जिस वक्त आपके हिस्से हार
होती है, किसी दूसरे के हिस्से जीत। दुनिया इससे ज़्यादा कुछ नहीं। हम दोनों शाम
होने तक अपने-अपने कमरों तक पहुँच गए थे।
Prelims का रिजल्ट तो आया लेकिन हम दोनों में से
किसी का नहीं हुआ, हम दोनों निराश थे और अजीब सी उलझन में भी। हम दोनों कई दिनों
तक सामान्य नहीं हो पाए। समझ नहीं आ रहा था कि गलती कहाँ हो रही है। असफलता के बाद
खुद को समझने के लिए जितना समय हमें चाहिए था, हम दोनों ने लिया। उसके बाद एक
ब्रेक के लिए शिवि अपने घर चला गया।
कोई नहीं
जानता लेकिन मरने वालों के पीछे जो रह जाते हैं, जो किसी भी तरह के हादसे के लिए
तैयार नहीं होते वे कभी स्वीकार नहीं करना चाहते
ईश्वर की नियति को।
हम दोपहर 2
बजे चाय पी रहे थे कि अचानक शिवि का
फोन बजा।
शिवि ने
मुसकुराते हुए उत्साह के साथ फोन उठाया
“हैलो” वह
अभी भी मुस्कुरा रहा था कि अचानक से उसके माथे की लकीरें सिकुड़ने लगीं। उसने
कुल्हड़ को
अब ज़्यादा ज़ोर से पकड़ लिया था।
“हम्म ठीक
है” और उसने फोन रख दिया
“तुम इतने serious क्यूँ हो गए?” सामने से कोई जवाब नहीं आया, मैंने
फिर पूछा-
“तुम ठीक
हो?”
“शायद
नहीं” उसने आधा पिया चाय का कप वहीं छोड़ दिया और जैसे कुछ निगलते हुआ बोला-
“मेरे साथ
चलोगी एक जगह”
“कहाँ?”
“चलोगी?”
“अभी?”
“हम्म”
उसने बेंच को ज़ोर से पकड़ लिया था और सिर हिलाते हुए नीचे कर लिया था
कभी-कभी
बिना कोई सवाल किए यूं ही किसी के साथ, सिर्फ एक तिनके भर भरोसे पर,
किसी अनजान रास्ते पर चल लेना चाहिए। कई बार उस
रास्ते पर चलने के लिए उसे हमारी नहीं हमें उसकी कहीं ज़्यादा जरूरत होती है। शिवि
ने कैब बुक की और मैं बिना कुछ पूछे उसके साथ कैब में बैठ गई। तमाम रास्ते वह चुप
रहा। मैं उसकी चुप्पी जी रही थी। मैंने उसे इस तरह से शांत पहले कभी नहीं देखा
था।मुझे उसके मौन से डर लग रहा था। जो लोग अचानक से चुप हो जाते हैं वे अपने भीतर एक पहाड़ तोड़ रहे होते हैं
और वे उस पहाड़ को किसी कुएं में तब्दील करना चाहते हैं जिसमें डूब कर वे मार
जायें।
कैब दिल्ली
के लोक नायक अस्पताल पहुंची। जिसे हम कभी नहीं जीना चाहते उसे जीना पड़े तो
हम ज़िंदगी
से उम्मीद करना छोड़ देते हैं। हम कम से कम में गुज़ारा करना सीख लेते हैं,फिर
वह चाहे धन
हो, प्रेम हो या प्रेम करने वाले लोग। हम दोनों कैब से उतरे और अस्पताल के
अंदर जाने
लगे। अंदर पहुंचते हुए शिवि ने किसी को फोन लगाया और पूछा-
“वे कहाँ
मिलेंगे?”
सामने वाले का कोई जवाब आया होगा और शिवि ने वह जवाब
सुनते ही फोन रख दिया। वह मुझसे बहुत तेज़ चल रहा था। मैंने अभी तक ये नहीं पूछा था
कि हम यहाँ क्यों आए हैं। हम मॉर्च्युरी की ओर बढ़ रहे थे और मेरी धड़कने बहुत अधिक
बढ़ चुकी थी। शिवि अभी भी मुझसे बहुत तेज़ चल रहा था।
“हम यहाँ क्यूँ आए हैं?” मैंने डरते हुए पूछा
“मेरा यहाँ होना ज़रूरी है, मैं तुम्हें यहाँ क्यूँ
लाया, जानता नहीं” शिवि ने बिना पीछे मुड़े कहा, उसका स्वर गंभीर से अधिक पीड़ा लिए
हुए था। मैंने दोबारा कोई सवाल नहीं किया। हम शव-कक्ष में पहुंचे तो वहाँ काम करती
नर्स ने पूछा-
“आप किसके साथ हैं?” उसने ऐसे पूछा जैसे कोई तीसरा अभी भी हमारे साथ है। जो चले जाते हैं वे हमेशा हमारे
साथ रहते हैं।
“प प.. प्रकाश झा” शिवि ने कांपते हुए स्वर से कहा।
मैं इस नाम को जानती थी, प्रकाश झा शिवि के पिता हैं। नर्स ने जिस स्थान की ओर इशारा किया, हम वहाँ पहुंचे। हम एक मृत व्यक्ति
के सामने थे। शव-कक्ष में
ठंड होने के बावजूद हमेशा कई खून जल रहे होते हैं। जो व्यक्ति अपना सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा खो देता है
उसे सांत्वना देना बेहद टुच्चेपन से भरा होता है। मैं शिवि के सामने खड़ी
नहीं हो पा रही थी, मुझे कोई सहारा चाहिए था लेकिन शिवि... शिवि अब भी पूरी मजबूती
के साथ शव के सामने खड़ा है और बस खड़ा है, उसमें कोई क्रिया नहीं है, कोई हल-चल
नहीं है, आँखें एक टक शव की ओर हैं, वह ऐसा प्रतीत हो
रहा है जैसे सोये हुए शव को खड़े रहकर देखता हुआ दूसरा शव। उसने अपने दायें
हाथ से शव को ढके हुए सफेद चादर को उसके चेहरे से हटाया। ये शव सच में उसके पिता
का था और अस्पताल वालों ने पहचान के लिए उन्हें मुर्दाघर में रखा था। जब भीतर से सब कुछ खाली होने लगता
है तो उसे बाहर आने वक्त लगता है। वह कुछ देर तक उन्हें सिर झुकाए देखता
रहा फिर उसकी एक आँख से एक आँसू उनके माथे पर जा गिरा, शायद उन्हें एक चुंबन की
जरूरत थी या शायद शिवि को उनसे गले लगना था। मैंने शिवि के कंधे पर हाथ रखा और
जैसे अचानक से कोई बांध टूट गया, वह धम्म से उनकी छाती पर जा गिरा और उन्हें गले
लगाते हुए बहुत देर तक रोया। मेरे भीतर जैसे कोई पत्थर इधर उधर लुढ़क रहा था। नर्स ने मुझे रीसेप्शन से कागजात लाने को कहा।
मैंने रीसेप्शन से प्रकाश झा की फाइल मांगी, उन्होंने
मुझे सारी फॉर्मैलटीज़ पूरा करने को कहा, मैंने हामी भरी, मैंने नर्स से उनकी
मृत्यु का कारण पूछा तो उन्होंने कहा-
“these bastard rash
drivers, ये लोग कभी नहीं मानेंगे कि इनकी वजह से लोगों की
ज़िंदगियाँ बर्बाद हो रही हैं, मरने वालों से ज़्यादा उनकी जो पीछे रह जाते हैं”
मैं बिना कुछ कहे शव-कक्ष की ओर गई। शिवि ने खुद को
संभाल लिया था कम से कम थोड़ी देर के लिए।
“documents?”
“हाँ, यहाँ साइन करने हैं”
इतनी सी बात के बीच बहुत कुछ था, शिवि की सूजी हुई
लाल आँखें, कांपते होंठ, डरते हाथ और उसे
भरोसा देती हुई मेरी नम आँखें। मैंने उसे पेन दिया और उसने भी बस साइन कर
दिए। वह इससे अधिक कुछ नहीं कर सकता था जैसे मैं नहीं कर पाई थी। हम दोनों वहाँ से
रीसेप्शन की ओर जाने लगे तो उसने कहा-
“फोन अस्पताल से ही था”
मैं उसे सुन रही थी।
“जब एक्सीडेंट हुआ लोग उन्हें चंडीगढ़ ही अस्पताल ले
गए, इंजरी सीरीअस थी तो उन्हें दिल्ली रेफर कर दिया गया।”
और वह चुप हो गया जैसे वह इस बात को महसूस करना चाहता
हो कि वह कभी ज़िंदा थे। उसने गहरी सांस ली और फिर बोला-
“this accident has taken everything from me” उसने अपनी शर्ट से फिर आँसू पोंछे और वह दीवार को पकड़ वहीं खड़ा हो गया,
शायद उसे सहारे के लिए उसके पिता चाहिए थे।
“घर में पता है?”
“पता नहीं” उसने हिम्मत जुटाते हुए कहा
किसी अपने को मरा हुआ घोषित करने के लिए अपने भीतर जीने की
इच्छा रखने वाले टुकड़े को एक भारी-भरकम पत्थर से कुचल कर मार देना होता है, जब तक
वह टुकड़ा पूरी तरह से दम नहीं तोड़ देता, हम तब तक यह नहीं कह पाते कि कोई हमारा अब
इस दुनिया में नहीं रहा।
अंकल की बॉडी को अगली सुबह उनके घर तक पहुंचाया जाना
था। शिवि ने घर फोन कब किया पता नहीं लेकिन उस रात हमने एक दूसरे के आंसुओं को
पिया। शिवि पूरी रात रोता रहा, वह जैसे बच्चा सा हो गया था जिसे अगले ही दिन बड़े
हो जाना था। वह रात भर बच्चे सा मेरी गोद में सिर रखे रोता रहा। सुबह मेरे उठने से
पहले ही वह जा चुका था। जब मैं जागी तो उसका एक व्हाट्सप्प मैसेज मेरे फोन में था
कि-
“पता नहीं कितने दिन लग जाएंगे, अभी निकल रहा हूँ,
जैसे ही सब ठीक होता है मैं आ जाऊंगा”
मेरे इंस्टाग्राम पर भी एक मैसेज था-
“Are you in Lok Nayak Hospital?”
मैसेज संध्या नाम की id से था।
मैसेज पढ़कर मैं सकपका सी गई लेकिन फिर भी मैं अपना ध्यान उस ओर केंद्रित नहीं करना
चाहती थी। मैंने इंस्टाग्राम डिलीट किया और शिवि को रिप्लाइ किया-
“stay strong, I am always there for you”
जिसके साथ आप दुख बाँट चुके होते हैं और जिसके साथ आप
दुख बांटना चाहते हैं, उनके बीच यदि कभी संघर्ष होगा तो हमेशा वे जीतेंगे जिनके
साथ आप दुख बाँट चुके होते हैं। मैंने संध्या का कोई रिप्लाइ नहीं किया। 10 दिन तक
शिवि से फोन पे बात नहीं हुई, सिर्फ व्हाट्सप्प पर ही थोड़ी बहुत बात होती जिसमें
वह सब नहीं पूछा जा सकता था जो आप दरअसल पूछना चाहते हैं। एक समय तक पारिवारिक दुख
आपको अक्सर अकेले ही झेलने पड़ते हैं उन्हें आप चाह कर भी किसी दोस्त से नहीं बाँट
सकते। 11 वें दिन शिवि का मेरे पास फोन आया, मैं लाइब्रेरी थी तो उठकर बाहर आई-
“हैलो”
‘कैसे हो?’ पूछना कुछ ठीक नहीं लग रहा था
“हैलो, उमा”
“तुम ठीक हो?”
“हाँ सब ठीक है यहाँ” इसके बाद चंद पलों के मौन में
सारा दर्द एक बार के लिए जीवंत हो उठता है इस पार भी और उस पार कुछ ज़्यादा।
“दिल्ली कब आ रहे हो”
“पता नहीं अभी तो”
“aunty कैसे हैं”
“हाँ, ठीक है वो भी लेकिन चुप सी हो गईं है यार” मैं
शिवि की तेज़ साँसों को सुन सकती थी
“तुम संभालों यार, खुद को भी”
“हम्म” वह जैसे कुछ निगल रहा था
“चलो रखता हूँ मैं”
“दिल्ली जल्दी आना”
“हम्म”
मैंने एक लंबी सांस ली और इंस्टाग्राम डाउनलोड किया,
मैसेज बॉक्स में मैसेज-
“Are you in Lok Nayak Hospital?”
“Want to meet you if you are comfortable”
मैंने उसे मैसेज भेजा-
“तुम अभी दिल्ली में हो?”
उसका करीब 2 घंटे बाद रिप्लाइ आया-
“हाँ कुछ दिनों के लिए”
मैंने मैसेज किया-
“कल Moonpie café, शाम 5
बजे?”
“works for me”
मैंने अंगूठे वाला इमोजी भेज दिया। मुझे कभी नहीं लगा
था कि मैं उससे इतनी सीधे तरीके से बात कर पाऊँगी। मेरे दिल और दिमाग में कोई हरकत
नहीं थी।मैं फिर से किसी भावनात्मक तूफान में नहीं उलझना चाहती थी।
अगली शाम 5 बजे Moonpie Café:
मैंने उस दिन हल्के हरे रंग की शॉर्ट कुर्ती और डार्क
ब्लू जीन्स पहनी थी, नीचे जूतियाँ थीं और बाल खुले हुए थे। मैं करीब 4:45 पर कैफै
पहुँच चुकी थी। मैंने संध्या को इंस्टाग्राम कॉल लगाई तो उसने कहा कि वह दरवाज़े के
पास वाले टेबल पर ही बैठी है। मैं अंदर पहुंची तो बिल्कुल दरवाज़े के पास वाले टेबल
पर वह बैठी हुई थी, उसकी नजरें फ़ोन में थीं। मैंने एक लंबी सांस लेते हुए कहा-
“hi , संध्या?”
उसने नजरें ऊपर उठाईं और वह मेरे अभिवादन के लिए उठ
खड़ी हुई, उसने हाथ मिलाने के लिए मेरी तरफ हाथ बढ़ाया। मैंने पहली बार संध्या को
देखा था। खूबसूरत और विनम्र चेहरा, आँखों पर गोल फ्रेम का चश्मा, केवल कंधों को
ढके हुए खुले बाल, लंबाई में मुझसे ज़रा सी कम, रंग मुझसे अधिक साफ, वह पाकिस्तानी
कुर्ता जिसका मूलत: रंग off व्हाइट था और उसके ऊपर हल्के भूरे
और स्लेटी रंग के सूक्ष्म पुष्प प्रिंट किए हुए थे, कुर्ते के साथ ऑफ व्हाइट रंग
की ही wide leg pent और नीचे सफेद रंग के सैन्डल। वह बेहद
खूबसूरत लग रही थी। मैंने हाथ मिलाया और हम अपनी-अपनी जगह बैठ गए। सब कुछ असामान्य
होते हुए भी सामान्य लग रहा था। संध्या ने बात शुरू की-
“कैसी हो उमा?”
“तुम मुझसे क्यों मिलना चाहती थी?”
“चाय या कॉफी?”
“तुम कॉफी पीती हो ना”
“हाँ, तुम्हारे लिए क्या ऑडर करूँ?”
“कॉफी” मैंने तेज़ होती सांस के बीच हड़बड़ाहट में कहा
उसने 2 कॉफी ऑर्डर की और कुछ देर के लिए हम बस यूंही
बैठे रहे। न संध्या ने कुछ कहा, ना ही मैंने फिर एकाएक संध्या ने मौन तोड़ा और कहा-
“तुम और प्रशांत एक ही क्लास में थे न”
मैंने हाँ में सिर हिला दिया।
“तुम जानती हो मेरे बारे में?” उसने मुझसे पूछा
“हाँ, उसने मुझे बताया था कि वो किसी से प्रेम करता
है”
“ok ok” वह हल्का सा मुस्कराई लेकिन उसके मुस्कराने
में कोई विकार भाव नहीं था।
“प्रशांत कैसा है?”
अचानक उसके चेहरे पर गंभीरता छा गई। कॉफी आ चुकी थी
मैंने कॉफी का कप अपने हाथ में ले लिया था।
“He is in the hospital”
मैं ये सुनकर थोड़ा घबरा गई-
“Hospital मतलब, I hope it is not serious” मैंने एक बनावटी सी हंसी
अपने चेहरे पर ओढ़ी।
“he is” ये कहते हुए उसने अपनी
आँखें मेरी आँखों पर टिका ली थी।
जब तक अतीत
आपके सामने आकर खड़ा ना हो जाए, वह आपको विचलित नहीं कर पाता लेकिन जब अतीत वर्तमान
बनकर आ पहुंचे तो उसकी जकड़न से छूट पाना नामुमकिन सा हो जाता है।
मैंने कॉफी का कप वापिस टेबल पर रख दिया।
“क्या हुआ उसे?” डर मुझे घेरने की भरपूर कोशिश कर रहा
था और मैं उससे छिपने की।
“2 साल पहले एक उसे seizures
आने शुरू हुए थे, लेकिन एक बार उसे बैठे-बैठे seizure आया तो वह सिर के बल ज़मीन पर गिर पड़ा, उसे ब्रेन इंजरी हो गई। उसके बाद से
he is suffering from Post-traumatic epilepsy”
सब पीछे छूट गया वो जो कभी साथ था और वो भी जो कभी
साथ नहीं था। प्रशांत पीछे
जाए जा रहा था मेरी स्मृति में, वो फिसल रहा था जैसे कभी मुझमें स्थायी था ही नहीं।
मैं उसके पीछे जाए जा रही हूँ लेकिन वह मुझसे दूर जाए जा रहा है, साँसों में कुछ
अटक हुआ सा है, छाती में अजीब सा दर्द उठ रहा है, मुझे चिल्लाता हुआ सन्नाटा सुनाई
दे रहा है, सब कुछ नम सा पड़ गया है सब कुछ निर्जीव लग रहा है, हर जगह पीड़ा बिखरी
पड़ी है, दिल-ओ-दिमाग में तूफान उठ रहा है। मैंने अचानक बहुत धीमे से कहा-
मैंने अजीब से अविश्वास से उससे पूछा-
“तुम ठीक हो?”
वह जैसे एक पल के लिए जड़ हो गई। वह अपने भीतर बहुत
कुछ लिए हुए थी जिसे बहुत गरिमा से ढकना जानती थी।
“पता नहीं यार”
मैंने उसके हाथ पर अपना हाथ रख दिया।
“तुम प्रशांत के लिए कविताएँ लिखती थी ना?” उसने बहुत
विनम्रता से पूछा और अपना कॉफी का कप उठा लिया।
“हाँ” मैंने जवाब ज़रा देर से दिया और अपनी नजरें कॉफी
के कप पर गड़ा ली
“उसे तुम्हारी एक कविता बहुत पसंद है” वह ये कहते हुए
फिर मुस्कराई।
“कौन सी?” मैंने हैरान होते हुए पूछा
“अभी पढ़कर सुनाओगी?”
“अभी?” मैं उस वक्त वहाँ से भाग जाना चाहती थी
“क्यों नहीं? वो है ना कोई... तुम्हारा प्रेम
स्वतंत्र नहीं हो सकता”
मैं कुछ भी नहीं पढ़ना चाहती थी लेकिन उसकी आँखों में
कुछ तो था जिसने मुझे पढ़ने का साहस दिया।
“मुझे अभी याद नहीं है पर मैं पढ़ सकती हूँ”
कविता पढ़ने से पहले मैंने कॉफी के कुछ घूंट गले से
उतारे। मैंने पूरी कविता फोन से पढ़कर कही-
जब भी हृदय में तुम्हारे लिए प्रेम उमड़ा है,
वह स्वतंत्र नहीं होता
उसके साथ आता है भय,बेचैनी,
बहुत से सवाल,कुछ तुमसे कुछ खुद
से
मुझे परेशानी इन भावों से नहीं
किंतु विभाव से है
मैं चाहती हूं विभाव केवल स्वतंत्र भाव उपजे और
मेरे हृदय में विचलन के विपरीत स्थायित्व हो
कैसा होगा एक जगह बंद रहकर स्वतंत्र होना,
कैसा होगा तुम्हारे प्रेम का स्वतंत्र होना?
तुम्हारे दाहिने बाजू के बराबर मेरे दाहिने बाजू का
होना
मन में दुख उत्पन्न करता है
और सवाल करता है
क्या हम विपरीत की जगह एक दिशा में नहीं चल सकते?
क्या तुम्हारा प्रेम स्वतंत्र नहीं हो सकता?
संध्या ने कविता सुनते हुए अपनी आँखें बंद कर ली थी,
वह जैसे कविता के साथ कहीं बह जाना चाहती थी। कविता खत्म होने पर मैंने उससे पूछा-
“उसे ये कविता क्यों पसंद है?”
ऐसा लगा मानो वह नींद से उठी हो, उसने से झटके से आँख
खोली।
“इस कविता में ठीक वही प्रश्न है जो उसने मुझसे पूछे
थे, वो ये कविता मुझे सुनाता था तो हम अक्सर अपने पुराने दिनों को याद करने लगते
थे, 4 साल हो गए हैं और अब तो जैसे एक दूसरे की आदत हो गई है” वह आँखों में आँसू
छिपाते हुए मुस्करा रही थीं। मैं उसका जवाब सुनकर थोड़ी देर चुप हो गई और फिर कहा-
“देखिए संध्या, ये कविताएँ सिर्फ मेरी भावनाओं की उपज
है, मेरी इनसे आपके जीवन में दखलंदाज़ी करने का कोई इरादा नहीं है और अब तो मेरे
जीवन में कोई है” मैं उसे समझाना चाहती थी कि प्रशांत मेरे जीवन में क्या स्थान
रखता है।
“जानती हूँ, मैं भी तुम्हें कोई ठेस पहुंचाने के
इरादे से नहीं मिलना चाहती थी”
वे ये कहकर फिर मुस्कराई और मैं ये सुनकर। उसने फिर
कहा-
“मुझे सिर्फ ये कविता चाहिए थी, और जिसने लिखी है
उससे भी मिलना चाहती थी, सिर्फ तुम्हें appreciate करने के
लिए”
“मैं तुम्हें कविता मैसेज कर दूँगी”
हम दोनों ही आधा कप कॉफी पी चुके थे। माहौल अब थोड़ा
सहज हो गया था। शाम के 6 बज चुके थे लेकिन उस दिन हम दोनों के पास वक्त की कमी
नहीं थी।
“प्रशांत कब तक ठीक हो जाएगा संध्या?” मैं अपनी आंखों
में उभर रही फिक्र को छुपाना चाहती थी।
“शायद जल्द ही” उसके इस कथन में ज़रा भी आशा नहीं थी।
“उसके परिवार वाले यहीं है?”
“हाँ, उसके पापा यहीं है, मम्मी कल ही घर गई हैं”
“बड़े लोग बेहतर संभाल सकते हैं”
“हाँ, कोई भी संभाल ले लेकिन सब संभल जाए, I can’t
lose him, I have lost everything Uma” संध्या ने यह एक सांस में
बोल दिया और वह अचानक रो पड़ी। बांध अचानक ही टूटता है। मैं उसे कुछ नहीं कह पाई,
उसने अपने गिरते आंसुओं को किस पत्थर से रोका, दुख से सिकुड़ती अपनी देह को उसने
कैसे सीधा किया, अपने कांपते हाथों को कैसे रोका, ये मैं कभी नहीं जान सकती। मैं
उसे देखकर भीतर से सन्न रह गई थी। उसका चेहरा एक पल में ही ऐसा दिखने लगा मानो कई
सालों से ज़िंदगी ढोने का तजुर्बा हो। उसने अपने आप को संभाला और विषय बदलने के लिए
मुझसे पूछा-
“और घर पे सब कैसे हैं?”
“सब बढ़िया, तुम बताओ” हम दोनों ने ही नकली मुस्कान ओढ़
ली। मैंने पूछा-
“तो अभी जॉब वगैरह कोई”
“नहीं, खुद का बिजनस है छोटा सा”
“अच्छा है”
“जब प्रशांत ठीक था तब मैंने कभी उससे ये कविता मांगी
ही नहीं, कभी इतना ध्यान ही नहीं दिया लेकिन अब याद आती है बहुत, मैं कभी भी ये
कविता खोना नहीं चाहती थी, इसलिए तुमसे मिली, I hope so कि
तुम्हें awkward नहीं लगा होगा”
मैं ना में सिर हिला दिया।
दुख प्रेम से बड़ा होता है, संध्या का दुख भी मेरे लिए
प्रशांत से बड़ा हो चुका था।
मैं उस समय बहुत कमज़ोर महसूस कर रही थी इतना कि सब
कुछ राख के ढर्रे सा कभी भी उड़ सकता था। वह एक पल तक तटस्थ सी मेरी ओर देखती रही।
मैं सिर झुकाए हुए उसका मेरी ओर देखना महसूस कर सकती थी। फिर उसने एक लंबी सांस ली
और मुस्कराते हुए कुर्सी से उठते हुए कहा-
“मुझे कविता ज़रूर भेजना”
मैं जब तक नजरें ऊपर उठाकर देखती वह दरवाजे से निकल
चुकी थी। थी। जो कुछ भी हुआ मेरे लिए वह बहुत अधिक था। मैं कई देर तक उस कांच के
दरवाजे से उसका जाना देखती रही। उस शाम की संध्या मेरी लिए कोई देवी हो गई थी। मैं
तकरीबन उसी कैफै में 1 घंटे तक बैठी रही, कोई भी विचार दिमाग में नहीं कौंध रहा था
लेकिन सब कुछ आँखों के सामने बह भी रहा था। अक्सर ऐसे क्षणों में हम कुछ बोल नहीं
पाते, स्वयं से भी नहीं। मैंने कैफै से निकली तो समय 8 बज चुके थे। मैंने अपने
कमरे पर पहुँचकर अपना और संध्या का जिया हुआ एक होकर जिया। वह रात ठीक फिर से
मुझसे सब कुछ लेकर जा रही थी जैसे मेरे पिता की मृत्यु मुझसे मेरा सब कुछ लेकर गई
थी लेकिन इस ले जाने के बीच कुछ मेरे भीतर कुछ अलग प्रवेश कर रहा था। संध्या से
हुई मुलाकात ने मेरे भीतर कुछ तो बदल दिया था। वह जो जी रही थी वो मुझसे भी बहुत
गहरा और दर्द भरा था, मैंने खुद से वादा किया कि मैं खुद को प्रशांत से कभी नहीं
जोड़ूँगी, अतीत के संदर्भ में भी नहीं। मैं संध्या के दुख साथ अन्याय नहीं कर सकती
थी और ना ही शिवि के प्रेम से और विशेषत: तब जब दोनों ने अपना अपना दुख मुझसे
बांटा हो।
भीतर
मन में है सवेरा, बाहर सब अंधेरा रे
जो तेरा-ना वो तेरा ना, जो तेरा-वो तेरा रे
और मेरा था-शिवि, मेरी थी कविताएँ, प्रशांत का वो
हिस्सा कभी मेरा था ही नहीं जिसे मैंने खुद बनाया था, संध्या का प्रशांत उससे
बिल्कुल जुदा है और वह सम्पूर्ण उसका ही है।
मैं सुबह कुछ देर से उठी, बहुत दिनों बाद अपने लिए
चाय बनाई। चाय बनाने के बाद शिवि के पास फोन किया-
“हैलो”
“कब आ रहे हो शिवि दिल्ली?”
“आज तेहरवीं है, परसों आता हूँ”
“सब ठीक है?”
“सब ठीक हो जाएगा” उसके कहे में भरोसा था
“जल्दी आना”
“हम्म, रखता हूँ”
मैं नहा-धो चुकी थी और शीशे के सामने बाल बना ही रही
थी कि अचानक मेरी आँखों को सूने कान खटकने लगे। भीतर अचानक उपजी भावना पर हमेशा भरोसा रखना चाहिए क्यूंकी कुछ
भी अचानक घटित नहीं होता। मैं अनायास ही वो पर्स खोजने लगी जिसमें बहुत जरूरी,बहुत
समय से मैंने रखा हुआ था। अलमारी के बिल्कुल नीचे वाले हिस्से में कपड़ों के बीच वह
पर्स था। मैंने उसमें से शिवि के दिए झुमके निकाले। कानों ने झुमकों को देखते ही
अपने आप पहन लिया, शीशे ने मुझे देखा और वह मुस्करा दिया। मैं बहुत लंबे वक्त के
बाद ठीक वैसे तैयार हुई जैसे कॉलेज टाइम पे हुआ करती थी। उस दिन मैंने फिर से
‘मुझको’ फिर हल्की सी आज़ादी के बीच बहती थोड़ी सी वही घुटन महसूस की। उस दिन
लाइब्रेरी जाने का प्लान न जाने किसने ठुकरा दिया और पूरा दिन नृत्य और कविताओं के
साथ बिताया गया लेकिन अब इन दोनों के साथ यूपीएससी की किताबें भी दबे पाँव चली आई
थीं, कुछ काम उन लोगों के लिए कर लेने चाहिए जो इस दुनिया में बसर करने के लिए
बुनियादी जरूरतें आप तक पहुंचाते रहे भले ही आप उनसे भावनात्मक स्तर पर जुड़ न पाए
हों।
शिवि दिल्ली वापिस आ गया था और मैं उसे लेने मेट्रो
स्टेशन पहुँच चुकी थी। शिवि जैसे ही मेट्रो से बाहर आया वह एक बार के लिए मुझे
देखकर रुक गया और फिर अनायास ही स्टेशन से मेन रोड की तरफ जाने लगे।
“अच्छा जी, तो पहन लिए झुमके?” उसने मुझे छेड़ने के
अंदाज में कहा
शिवि इस तरह से व्यवहार कर रहा था कि जैसे कुछ हुआ ही
नहीं। हम अक्सर जिन चीजों को भूला नहीं पाते, उन्हें भूल जाने का ढोंग करते हैं।
“हाँ, बस ऐसे ही”
“मोर को मौका मिल ही गया” वह फिर हँसा
“घर पे सब ठीक हैं?”
“थोड़ा वक्त लगेगा यार”
“तुम ठीक हो?”
“अरे तुम हो ना मेरी कंपनी के लिए, पापा तो तुम्हारे
भी चल बसे” जैसे उसने कुछ बोझ हल्का करना चाहा।
मैंने उसके कंधे पर हाथ रख दिया और दोनों मुस्करा
दिए। हमारे दुख समझने वाला
इस संसार में कोई एक भी हो तो हमें भगवान का लाख शुक्रिया करते रहना चाहिए।
हम दोनों सीधे हमारी चाय वाली टपरी पर पहुंचे। हम दोनों ने बहुत सी बातें की। वे
दुख भरी बिल्कुल नहीं थी लेकिन चिंता भरी थी। शिवि की बातों में पहले से ज़्यादा
हँसी-मज़ाक, खुलापन था लेकिन उसके शरीर में एक अजीब तरह की जकड़न थी जिसे शायद वह भी
महसूस नहीं कर पा रहा था। कुछ हादसे हमें सदा के लिए जकड़े रखते हैं। उसने अपने फोन
में उसके पिता की आखिरी तस्वीर दिखाई, सफेद चादर में लिपटे हुए उनके चेहरे पे जो
शांति थी उसमें वे बिल्कुल अपने बेटे जैसे दिख रहे थे। उसने पूरी बाजू की शर्ट
पहनी थी और बटन नीचे तक बंद किए हुए थे, जब वह तस्वीर दिखा रहा था तो मैंने देखा
कि शिवि की कलाई पर कुछ जले हुए का निशान बाहर की तरफ झांक रहा था।
“ये क्या हुआ” मैंने कलाई पकड़ते हुए पूछा
“अरे कुछ नहीं …” मैंने उसके बाजू
का बटन खोल दिया और उसे ऊपर की तरफ खींच दिया।
“ये क्या है?” मैंने गंभीरता से पूछा, शिवि ने अपना
सिर नीचे कर लिया और जितने आँसू वह छुपाये थे, सब बह गए, उसने उस जकड़न को उस क्षण
कुछ अधिक महसूस किया, उसने अपनी मुट्ठी को बहुत ज़ोर से बंद कर लिया। उसका हाथ अभी
अभी मैंने पकड़ा हुआ था।
“पापा को अग्नि कैसे दे दी मैंने?” वह रोते हुए जैसे
किसी तूफान से लड़ रहा था।
“अग्नि देने के बाद लगा कि वे नहीं जा सकते, मैं
उन्हें रोकने के लिए भागा लेकिन न जाने किसी ने मुझे पकड़ लिया” उसकी आँखों में वो
आग उतर आई थी। उसका हाथ अभी भी मेरे हाथ में था।
“उन्होंने जाने नहीं दिया यारर...” उस आग से बहता
पानी आग से ज़्यादा जल रहा था। मेरे हाथ की पकड़ ढीली पड़ गई, मैंने उसे गले लगा
लिया। गले लगाते ही शिवि को जो जकड़े हुए जो भी था वह एक पल के लिए उससे जैसे आज़ाद
हो गया। वह निढाल सा मेरी बाहों में आंसुओं के बीच बह सा गया।
कुछ देर बाद जब वह संभला तो बोला-
“अबे फिर रुला दिया तूने”
“सॉरी” मैंने कान पकड़ लिए
“अरे भैया चाय नहीं आई अब तक” उसने चाय वाले भैया को
आवाज़ दी
“अच्छा आज रात की चाय मेरी तरफ से”
“अच्छा जी किस खुशी में?”
“इतने दिनों से तुम्हारे बिना रात की चाय नहीं पी यार
तो सोच जब तुम आओगे तो चाय मैं बनाऊँगी”
पीड़ा छुपते हुए सामान्य बातें करने से माहौल थोड़ी देर
में अपने आप सामान्य हो जाता है। थोड़ी देर बाद चाय आई और चाय पीते हुए हम दोनों के
बीच की हवा बहुत सुकून भरी हो गई थी। चाय खत्म होने तक हमने कोई बात नहीं की लेकिन
सब समझ भी लिया।
उसके बाद मैं और शिवि अपने अपने कमरों पे चले गए।
मैंने अपने कमरे पर पहुँचकर चाचा जी के पास फोन किया-
“नमस्ते चाचा जी”
“नमस्ते बेटा, कैसे हो”
“मैं बढ़िया चाचा जी, इस Sunday को घर आ रही हूँ मैं, चाची जी से कहना मेरे मनपसंद लड्डू बना के रखे”
वे ज़रा सा हँस दिए और बोले-
“बिल्कुल बेटा, जल्दी आना”
मैंने इससे पहले कभी हक से उन्हें कोई फरमाइश नहीं की
थी लेकिन ऐसा करके उस दिन कुछ हल्का महसूस हुआ।
रात को मैंने शिवि को फोन किया-
“मैं चाय बना रही हूँ, थोड़ी देर में आ जाना ऊपर”
“ok”
मैं ऊपर पहुंची तो शिवि पहले से वहीं था।
“आ गई चाय” मुसकुराते हुए कहा। हमने अपना-अपना कप हाथ
में लिया।
“जनाब आपके बिना तो अब चाय अच्छी ही नहीं लगती” वह
मुस्करा दिया।
“यार उमा, सोच रहा हूँ कि कोई प्राइवेट जॉब ले लूँ,
चंडीगढ़ ही, दिल्ली भी चलेगी, यूपीएससी का कुछ पता नहीं यार, इस साल हो ना हो, वैसे
तो मम्मी मैनेज कर लेंगी लेकिन मैं नहीं चाहता वे अब परेशान हों”
“तुम्हें जैसा ठीक लगे शिवि वैसे करो”
“जब घर था तो एक दोस्त से कहा था कि कहीं वैकन्सी हो
तो बताए, यहीं है वो दिल्ली ही कॉर्पोरेट में”
“तो बात बनी कहीं?”
“शायद बन जाए, उसने अपने बॉस से बात कि है content writer के
लिए, उनकी वेबसाईट है एक, उसके लिए आर्टिकल चाहिए उन्हें”
“टेंशन मत लो, response positive ही
आएगा”
“hope so, इतना साहित्य पढ़ा है,
कहीं तो काम आए”
अगले दिन से हम दोनों ही अपने-अपने कामों में उलझ गए।
कुछ 2 हफ्तों के बाद शिवि को अपने दोस्त की ही कंपनी में नौकरी मिल गई। मैं भी
यूपीएससी की तैयारी पहले से भी गंभीर होकर करने लगी। जितनी भावनात्मक गांठें थी
खुल चुकी थी। अब ना कुछ खाली लगता था ना कुछ खाली को भरने की ज़िद थी। शिवि ने जिस
तरह से खुद को संभाला, काम किया और करता रहा, मैंने कभी नहीं किया। उसे देखकर
एहसास होता रहा कि भावनाओं के अथाह समंदर में डूब जाना ही एक मात्र विकल्प नहीं
होता कभी-कभी नाव बना लेना ही सबसे सुखद होता है। शिवि ने अपनी नाव बना ली थी और
अब मैं भी उसमें सवार थी। अगले अटेम्प्ट में सिर्फ प्री पास हुआ, उससे अगले में
रैंक 406 मिला, इंडियन पोस्टल सर्विस मिली। 2 सालों के इस अंतराल में शिवि ने
फिरसे कभी यूपीएससी देने का नहीं सोचा और मेरी भी कविताएँ आज तक किसी फ़ोल्डर में
ही धूल कहा रही हैं। मेरी जॉब के ठीक एक साल बाद हमने शादी कर ली। चाचा-चाची से अब मेरे पहले से बहुत गहरे संबंध
है, भावनात्मक अंतराल धीरे-धीरे खत्म हो रहा है।शादी के बाद से मेरा घर चाचा-चाची
ही संभालते हैं, अब कम से कम ताला मुझसे नाराज नहीं रहता, तस्वीरें अभी भी जल उठती
हैं लेकिन शिवि सब संभाल लेता है। शिवि न होता तो मैं कभी नहीं सुलझ पाती। आज
हमारी शादी को पूरा एक साल हो गया है और मैं जानती हूँ कि वह मेरे लिए झुमके जरूर
लाया होगा। हम दिल्ली के एक कैफै में कॉफी डेट पर आयें हैं, लेकिन चाय पीना हमें
अभी भी नहीं छोड़ा है, हाँ बस कॉफी पीने लगे हैं हम। इस मौके के लिए एक कविता लिखी
है-
इश्क़ तुमसे जो मांगे दे देना
अगर इश्क़ करना चाहते हो तो
इश्क़ पकाने में लगती है मेहनत
पसीना कर देता है तुम्हें तरबतर
जलते रहना इश्क करने की शर्त होती है
तो जलते रहना अगर इश्क़ करना चाहते हो तो
जुनून की हद को पार करके इश्क़ करना
बार-बार मर जाना होता है इश्क़ करना
तो मरते रहना इश्क़ करना चाहते हो तो
इश्क़ में तुम-तुम नहीं रह जाते
इश्क़ में बस बचता है
खुदा
तुम खुदा हो जाना
तुम इश्क़ हो जाना
कतरा-कतरा खून का इश्क़ में तब्दील कर देना
अगर इश्क़ करना चाहते हो तो
लड़ जाना, मर जाना खुद को
खत्म करने के लिए
अगर इश्क़ करना चाहते हो तो
फिर जब आखरी सांस भी उड़ जाएगी कहीं हवा में
और सदियों से जलती चिता जब ठंडी हो जाएगी
उस राख में महकोगे तुम
तुम खुदा बन जाओगे, तुम इश्क़ बन
जाओगे
फिर वो राख बड़े गुमान से हवा के हर कतरे में उड़ेगी और
कहेगी
इश्क़ किया था मैंने
हाँ इश्क़ किया था मैंने ।
मैं शिवि के इश्क़ में शिवि हो जाना चाहती हूँ और
जानती हूँ शिवि हो जाने पर भी उमा कहीं खो नहीं जाएगी।
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