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first novel draft

  `       झुमके...     झुमके     “ कितने सुंदर हैं ये ….मैंने ये झुमके पहले क्यूँ नहीं पहने यार ” शीशे में खुद को निहारना और खुद को खूबसूरत कहना एक   अलग संतोष पैदा करता है मन के भीतर , बहुत खुश थी आज मैं , नए झुमके मेरे कानों में ऐसे झूल रहे थे जैसे   बेफिक्र होकर हवा में उड़ता हुआ पंछी “ कल कॉलेज में यही पहन के जाऊंगी ”   मैंने बड़ा इतरा कर कहा , इस तरह   की इच्छा मुझे पहले कभी नहीं हुई थी , लेकिन इन दिनों मेरे ह्रदय का हाल कुछ और था , मैं चाहती थी कि वो   लड़का जो आखिरी बेंच पर बैठता है , सबसे शांत , केवल मौन , जिसकी मधुरता भरी मुस्कान मुझमें हलचल पैदा करने लगी थी ….वो मुझे देखे और बताये कि नए झुमके कैसे लग रहे हैं….मुझे लग रहा था कि आज जो झुमके पहने हैं वो सबसे सुंदर हैं क्योंकि आज शायद उसकी नज़र इन झुमकों पर पड़े और शायद उसे भी इन झुमकों में एक अलग सी स्वतंत्रता दिखे , एक अलग सी उड़ान दिखे , तो कितना अच्छा हो। कल्पनाओं की दुनिया कितनी   सुंदर होती है ना , लेकिन हमेशा कल्पना में रहना वास्तव में दुः...
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