मेरे पिता अक्सर रातों को जागा करते थे
वे कुछ देर चहलकदमी करते, एक सिगरेट पीते
कुछ देर बैठते और फिर इसी क्रम को दोहराते
इस क्रम में वे लगातार कुछ सोचते रहते
आज मैं पूरी रात जागी हूं
मैंने पूरी रात कुछ सोचा है
मैं अक्सर रातों को जागना नहीं चाहती
शायद वे भी नहीं चाहते होंगे
उनके माथे की लकीरें, चेहरे की बनावट
कुछ बनती बिगड़ती रहती
वे शायद कुछ सिगरेट के धुएं में उड़ाना चाहते थे
पर शायद कुछ उनके हाथ नहीं था
पर शायद कुछ उनके हाथ नहीं था
आज मेरे भी कुछ हाथ नहीं है
मैं भी पूरी रात सोई नहीं हूं
-रेणु कुंडु
RENU KUNDU
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